श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)
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Read in context१२ के प्रसंग में अविद्या की प्रत्यक्ष विषयता की स्थापना अविद्याऽनुमान का खण्डन, अनिर्वचनीय ख्याति और असत्ख्याति आदि का दूषण ज्ञापन एवं सत्ख्याति का समर्थन। तत्त्वमसि महावाक्य के अर्थ निरूपण के प्रसंग में अभेदवाद तथा औपाधिक एवं स्वाभाविक भेदाभेद वाद में सामानाधिकरण्य की अनुपपत्ति का प्रदर्शन। मनुष्यादि शरीरों मे आत्म विशेषणता का समर्थन। चेतन और अचेतन सभी वस्तुओं की ब्रह्म शरीरता एवं ब्रह्म की ही कार्य कारणात्मक अवस्था का प्रतिपादन। ब्रह्म तत्त्वविज्ञान मे अज्ञान निवृत्ति की अनुपपत्ति। सूत्रार्थ योजना और ब्रह्म विचार की व्यर्थता का संशय। ६. ब्रह्म विचार की आवश्यकता का प्रतिपादन, शब्द और अर्थ संबंधी प्रतीति के नियम का निरूपण, वेद की कार्यपरता के पक्ष मे भी ब्रह्म जिज्ञासा की आव- श्यकता का प्रतिपादन। शब्द की कार्यपरता का खण्डन। ‘शेष’ के लक्षण और विषय तथा कृत्युद्दे- श्यता एवं ‘नियोग’ पर विचार। पृ०४६-२२७ २ जन्माद्यधिकरण (सूत्र २) १. सूत्रार्थ निरूपण, जगज्जन्मादि के लक्षण में आपत्ति, तथा विशेषण, विशेष्य भाव पर विचार। २. [सिद्धान्त] ब्रह्म की जगज्जन्मादिलक्षणता का सम- र्थन, ‘‘सत्य-ज्ञान-अनन्त’’ शब्दों की व्याख्या ३. निर्विशेष ब्रह्मवाद में ‘‘ब्रह्मजिज्ञासा’’ और ‘‘जन्माद्य- स्य यतः’’ इन सूत्रों की अनर्थकता का प्रदर्शन। पृ०२२८-३६ ३ शास्त्र योनित्वधिकरण (सूत्र ३) १. सूत्रार्थ निरूपण। २. पूर्वपक्ष—ब्रह्म की शास्त्रयोनिता पर आपत्ति। ankurnagpal108@gmail.com