श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
by भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य)
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Read in context१३ ३. उत्तरपक्ष—ब्रह्म के संबंध में प्रत्यक्ष की अविषयता एवं ब्रह्म की अनुमेयता का समर्थन। ४. [सिद्धान्त]—ब्रह्म की शास्त्रयोनिता का प्रतिपादन और अनुमेयता का खण्डन। पृ०२३६-५३ ४ समन्वयाधिकरण (सूत्र ४) १- सूत्रार्थ निरूपण, ब्रह्मबोधक वेदांत वाक्यों की व्यर्थता और ब्रह्म की शास्त्रप्रमाणकता पर संशय। २. वेदांत वाक्यों की व्यर्थता का परिहार और नियोग विधि पर विचार मोक्ष की उत्पत्ति प्राप्ति आदि साध्य विलक्षणता का प्रतिपादन, शब्द आदि विधियों पर की गई शंका का परिहार तथा शब्द द्वारा अपरोक्ष ज्ञानोत्पत्ति का समर्थन। ३. जीवन्मुक्ति सिद्धान्त का खण्डन। मोक्ष की ध्यान नियोग साध्यता का समर्थन। ४. भेदाभेदवाद का निराकरण, जीवब्रह्म के स्वाभाविक अभेद तथा औपाधिक भेद का प्रतिपादन। ५. [सिद्धान्त]—ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता, और सिद्ध वस्तु प्रतिपादन में शब्द शक्ति का समर्थन। —पृ०२५३-६२ ५ ईक्षत्यधिकरण (सूत्र ५-१२) १. सांख्योक्त प्रधान की जगत् कारण अनर्हता ज्ञापन, प्रधान की जगत्कारणता पर संशय और समर्थन, प्रधान की अशब्दता का प्रतिपादन और जगत् कारणता का खण्डन। २. ईक्षणश्रुति की गौणार्थता की कल्पना करते हुए, प्रधान में ईक्षणता की संभावना, तथा उसकी ईक्षणता का निराकरण। ३. प्रधान की सत्शब्द प्रतिपादकता का खण्डन। ankurnagpal108@gmail.com