भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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विशिष्ट प्रतिपादनपरत्वं, अपितु विशेषणमुखेन स्वरूपमुपस्थाप्य तदैक्यप्रतिपादनपरत्वमेव इति । यदि यह मानें कि--कोई वस्तु एक विशेषण से विशेषित होने पर, दूसरी विशेषण विशिष्ट वस्तु से निश्चित ही विलक्षण या भिन्न होगी । जैसे, घट पट आदि में समान विभक्ति के होते हुए भी, एकता संभव नहीं हैं । वैसे ही अन्यत्र भी समान विभक्ति का निर्देश होने पर विभिन्न विशेषण विशिष्ट पदार्थों का ऐक्य नहीं होगा इसलिए समाना- धिकरण शब्द का विशिष्टार्थ प्रतिपादन में तात्पर्य नहीं होता, अपितु विशेषण के रूप से वस्तु के स्वरूप का उपस्थापन या बोध संपादन कराकर उन सबका ऐक्य प्रतिपादन करना ही उसका कार्य होता है । स्यादेतदेवम्—यदि विशेषणद्वयप्रतिसंबन्धित्वमात्रमेवैक्यं निरु- न्ध्यात् । न चैतदस्ति, एकस्मिन् धर्मिण्युपसंहर्तुमयोग्यधर्मद्वय- विशिष्टत्वमेव हि एकत्वं निरुणद्धि । अयोग्यता च प्रमाणान्तर- सिद्धाघटत्वपटत्वयोः । “नीलमुत्पलम्” इत्यादिषु तु दण्डित्व- कुण्डलित्वावद्रूपवत्त्वरसवत्त्वगन्धवत्त्वादिष्वच्च विरोधो नोप- लभ्यते । न केवलमविरोध एव, प्रवृत्तिनिमित्तभेदेनैकार्थनिष्ठत्व- रूपं सामानाधिकरण्यमुपपादयत्येव धर्मद्वयविशिष्टताम् । अन्यथा स्वरूपमात्रैक्ये अनेकपदप्रवृत्तौ निमित्ताभावात् सामानाधिकरण्य- मेव न स्यात् । विशेषणानां स्वसंबंधानादरेण वस्तुस्वरूपोपलक्षण परत्वे सत्येकेनैवस्तूपलक्षितमित्युपलक्षणान्तरमनर्थकमेव, उपलक्ष- णान्तरोपलक्ष्याकारभेदाभ्युपगमे तेनाकारेण सविशेषत्वप्रसंगः । हो सकता है, ऐसा हो, पर केवल दो विशेषणों का संबंध ही अभेद का निरोधक हो, ऐसा नहीं है, अपितु एक धर्मी (विशेष पदार्थ) से दो विभिन्न धर्मों वाले विशेषणों का संबंध सर्वथा अयोग्य है वही एकता का विरोधी है । घटत्व और पटत्व में जो इस प्रकार की अयोग्यता है, वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध होती है । “नील उत्पल” इस उदाहरण में