श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ ५. सर्वथानुपपत्त्यधिकरण [सूत्र ३०] सर्वशून्यवादी माध्यमिक सिद्धान्त का वर्णन । स्वमतानुसार सर्वशून्यत्ववाद का निराकरण । —पृ० ७८६-९३, ६. एकस्मिन्नसम्भवाधिकरण [सूत्र ३१-३३] १ जैनाभिमत सिद्धान्त का निरूपण । सप्तभंगी न्याय की असंगति । २ आत्मा की देह परिमितता, तथा संकोच विकास स्वभाव का खंडन । आत्मा की मोक्ष कालीन परिणाम की स्थिरता के आधार पर उक्त स्वभाव का निराकरण । —पृ० ७९३-८०२, ७. पशुपत्यधिकरण [सूत्र ३४-३८] पाशुपत मत का वर्णन । पाशुपत की असमंजसता का विवेचन अशरीर ईश्वर के प्राकृतिक अधिष्ठान की असंभवता प्रदर्शन । अशरीर जीव के इन्द्रियाधिष्ठान की तरह परमेश्वराधिष्ठान की स्वीकृति से ईश्वर में सुखदुःखादि भोग प्रसक्ति की संभावना प्रदर्शन । पशु- पति में पुण्य पाप की स्वीकृति से अनित्यतादि दोषों की संभावना का दिग्दर्शन । —पृ० ८०२-८, उत्पत्त्यसंभवाधिकरण [सूत्र ३९-४२] १. पांचरात्र सात्वतदर्शन के सिद्धान्त का विवेचन । २. पूर्वपक्ष-कर्त्तास्वरूप संकर्षण से कारणरूप प्रद्युम्न की उत्पत्ति का विरोध प्रदर्शन । ३. उत्तरपक्ष-संकर्षण आदि की विज्ञानमय ब्रह्मस्वरूपता हेतुक जीवोत्पत्ति के विवेचक पांचरात्र मत की प्रामाणिकता ज्ञापन । पांचरात्र शास्त्रानुसार ही जीव की स्वरूपतः उत्पत्ति का निषेध तथा पांचरात्र शास्त्र की वेद सम्मतता का प्रतिपादन । ४. (सिद्धान्त)— “न च कर्त्तुः करणम्” इत्यादि सूत्रों की शंकराचार्य कृत व्याख्या का निराकरण । सांख्य