भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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३६ (द्वितीय पाद) १. संध्यधिकरण (सूत्र १-६) १. पूर्वपक्ष—स्वप्नदृष्ट पदार्थों की जीवकर्त्तृता का श्रौत प्रमाणों से समर्थन। २. (सिद्धान्त) स्वप्नदृश्य की मायिकता का वर्णन। परमेश्वर की इच्छानुसार ही जीव की ज्ञानैश्वर्यादि शक्ति के तिरोधान और बंधन मुक्ति का प्रतिपादन। देह संबंध को जीव की शक्ति तिरोधान का कारण ज्ञापन। स्वप्नदर्शन की शुभाशुभ सूचकता का वर्णन। —पृ० ६२४-२६, २. तमसाधिकरण (सूत्र ७ ८) १. पूर्वपक्ष—हित नामक नाड़ी और आत्मा इन दोनों स्थानों में यथा संभव सुषुप्ति की संभावना का संशय। २. (सिद्धान्त)—नाड़ी, पुरीतत और आत्मा तीनों स्थानों में सुषुप्ति का निरूपण। सुषुप्ति भंग के समय ब्रह्म से जीव के उत्थान का वर्णन। —पृ० ६२६-३१, ३. कर्मानुस्मृतिशब्दविध्यधिकरण (सूत्र ६) जागरण के समय जीव के पुनरुत्थान का निरूपण। ४. मुग्धाधिकरण (सूत्र १०) मुग्धावस्था का स्वरूप निरूपण। —पृ० ६३१-३४, ५. उभयलिंगाधिकरण (सूत्र ११-२५) १. पूर्वपक्ष—जाग्रत आदि अवस्थाओं से संबद्ध ब्रह्म में दोष प्रसक्ति संभावना की शंका। २. (सिद्धान्त)—तीनों अवस्थाओं से संबद्ध होते हुए भी ब्रह्म की निर्दोषता तथा उसकी उभयलिंगता का निरूपण। कठशाखीय मत से एकस्थानस्थित ब्रह्म की निर्दोषता तथा शरीर स्थित होते हुए भी उसकी निराकारता का उपपादन। ankurnagpal108@gmail.com