श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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सुखवाला अनुभव करते हैं। ब्रह्म से भिन्न, दुःखरूप और परिमित सुखरूप जगत् की अनुभूति, कर्म निमित्तक ही है; जिसकी कर्मरूपा अविद्या छूट गई है, उसे, सारा जगत्, विभूतिगुणविशिष्ट, ब्रह्मानुभवरूप सुखमय प्रतीत होता है। जैसे कि-पित्तविकार ग्रस्त जीव को दूध पीना, रोग के अनुसार कम सुखकर अथवा दुखकर ही लगता है, वही दूध पित्तविकार रहित व्यक्ति को अति सुखकर प्रतीत होता है। जैसे कि-राजपुत्र को बाल्यावस्था मे पिता के वैभव विलास का यथार्थ ज्ञान नही होता, पर जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है उसे वैभव सुख की उत्तरोत्तर अनुभूति होती जाती है; वैसे ही जब जीव को, निस्सीम आनन्दस्वरूप ब्रह्म की असंख्येय अतिशय अगणित कल्याणमय गुणों वाली लीला के उपकरण स्वरूप जगत की, ब्रह्मात्मकता का आभास होने लगता है, तो उसे, जगत् मे ही, निस्सीम आनंद की अनुभूति होने लगती है। इस प्रकार वह, जगत् में, ऐश्वर्यविशिष्ट निस्सीम अतिशय सुखरूप ब्रह्म की अनुभूति मे निमग्न होकर, सुखरूपब्रह्म के अतिरिक्त, कुछ दूसरा नही देखता, और न दुःख ही देखता है। एतदेवोपपादयति वाक्यशेषः "स वा एष एवं पश्यन् एवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानंद. स स्वराड्भवति, तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति, अथ येऽन्य- थाऽतो विदुरन्यराजानस्तेक्षय्यलोका भवंति तेषां सर्वेषु लोकेष्व प्रकामचारो भवति" इति । स्वराट्-अकर्मवश्यः अन्यराजानः- कर्मवश्याः । तथा--"न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम्, सर्वं हि पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वशः" इति च । निरतिशय सुखस्वरूपत्वं च ब्रह्मणः "आनन्दमयोऽभ्यासात्" इत्यत्र प्रपंचितम् । अतः प्राणशब्दनिर्दिष्टात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तर- भूतस्य सत्यशब्दाभिधेयस्य ब्रह्मणो भूमेत्युपदेशात् भूमा परं ब्रह्म । उक्त तथ्य की ही पुष्टि प्रकरण का अंतिम वाक्य इस प्रकार करता है-"वह (उपासक) इस पुरुष का इस रूप से दर्शन करके, इस रूप से