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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४८२ ) एवं वाऽन्यभावव्यावृत्तिः, अन्यस्य सद्भावव्यावृत्तिरन्यभाव- व्यावृत्तिः यथैतदक्षरमन्यैरदृष्टं सदन्येषां द्रष्टृ च सत् स्वव्यति- रिक्तस्य समस्तस्याधारभूतम्, एवमनेनादृष्टमेतस्य द्रष्टृ च सदेत- स्याधारभूतमन्यन्नास्तीति वदन् "नान्यदतोऽस्ति द्रष्ट" इत्यादि- वाक्यशेषो अन्यस्य सद्भावं व्यावर्त्तयन्नस्याक्षरस्य, प्रधानभावं, प्रत्यगात्मभावं च प्रतिषेधति । अन्य की सद्भावना की व्यावृत्ति भी, इस सूत्र का तात्पर्य हो सकता है। "इसके अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा नहीं है" इस वाक्यांश में, अक्षर को अन्य से अदृष्ट तथा सभी का द्रष्टा बतलाकर, सभी का आश्रय सिद्ध किया गया है, इससे निश्चित होता है कि इसके दर्शन और आश्रय की, किसी भी अन्य से संभावना नहीं है। इस प्रकार, अन्यों की संभावना के प्रतिषिद्ध हो जाने पर अक्षर के प्रधान या जीवात्मभाव का स्वतः प्रतिषेध हो जाता है । किंच—"एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि, ददतो मनुष्याः प्रशंसंति यजमानो देवादर्वी पितरोऽन्वायत्ताः" इति श्रौतं स्मार्तं च यागदान होमादिकं सर्वकर्म यस्याज्ञया प्रवर्त्तते, तदक्षरं परब्रह्मभूतः पुरुषोत्तम एवेति विज्ञायते । तथा-"गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में ही, मनुष्य दाता की, देवता यजमान की तथा पितर दर्वी ( चरुपात्र ) की प्रशंसा करते हैं ।" इत्यादि से भी ज्ञात होता है कि-श्रौत स्मार्त, याग-दान-होमादि सब कर्म जिनके प्रशासन में संपन्न होते हैं, वे अक्षर, परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हो सकते हैं । अपि च—"यो वा एतदक्षरं गार्गि ! अविदित्वास्मिंल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद्- भवति, यो वा एतदक्षरंगार्गि । अविदित्वा अस्माल्लोकात् प्रैति ankurnagpal108@gmail.com

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