श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४८३ ) सकृपणः, अथ य एतदक्षरं गार्गि ! विदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स ब्राह्मणः ।” इति यदज्ञानात् संसार प्राप्ति यज्ज्ञानाच्चामृतत्व प्राप्ति स्तदक्षरं परं ब्रह्मैवेति सिद्धम् । तथा--'गार्गि ! जो लोग इस लोक में इस अक्षर को न जानकर होम यज्ञ करते हैं तथा हजारों वर्ष तपस्या करते हैं, उनका समस्त कर्म ( पुण्यभोग के बाद ) समाप्त हो जाता है, वे बेचारे दया के पात्र हैं । और जो अक्षर तत्त्व के ज्ञाता ( निष्काम भाव से उसका चिंतन करते हैं ) वे ही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण हैं ।' इत्यादि में, अक्षर को न जानने से संसार प्राप्ति और अक्षर ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति बतलाई गई है, जिससे सिद्ध होता है कि-अक्षर परब्रह्म ही है । ४ ईक्षतिकर्माधिकरणः— ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः ।१।३।१२॥ आथर्वणिकास्सत्यकाम प्रश्नेऽधीयते-“यः पुनरेतं त्रिमात्रेणो- मित्यनेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः ससा- मभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष- मीक्षते” इति अत्र ध्यायतीक्षतिशब्दावेकविषयौ, ध्यानफलत्वादीक्ष- णस्य, “यथाक्रतुरस्मिंल्लोके पुरुषः” इति न्यायेन ध्यान विषयस्यैव प्राप्यत्वात् “परं पुरुषं” इत्युभयत्र कर्मभूतस्यार्थस्य प्रत्यभिज्ञानाच्च । अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् के सत्यकाम के प्रश्न के प्रसंग में कहा गया कि-‘जो त्रिमात्रात्मक अक्षर रूप परंपुरुष का ध्यान करते हैं वह तेज में सूर्य के समान होते हैं; जैसे कि सर्प अपना केंचुल छोड़ देता है, वैसे ही वे भी पाप से छूट जाते हैं । वे सामगणों द्वारा, ब्रह्मलोक में ले जाए जाते हैं, वे इन जीवों से श्रेष्ठ परम पुरुष को हृदय में देखते हैं ।' यहाँ ध्यान और दर्शन दोनों को एक ही बतलाया गया है । वैसे दर्शन ankurnagpal108@gmail.com