भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४८५ ) प्राप्ति कराता है जो कि जीव समष्टि रूप चतुर्मुख ब्रह्मा का लोक है; इत्यादि बतलाया गया है । उस ब्रह्मलोक में प्राप्त जीवों का दृश्यमान पर पुरुष चतुर्मुख ही है । “श्रेष्ठ जीवों से भी श्रेष्ठ” इत्यादि में देह इन्द्रिय आदि से श्रेष्ठ देह इन्द्रिय आदि सहित घनीभूत जीव पुरुष से, ब्रह्मलोकवासी समष्टि पुरुष चतुर्मुख की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है । इससे ज्ञात होता है कि-उक्त प्रसंग में जिस परंपुरुष का व्या- ख्यान किया गया है, वह समष्टि पुरुष चतुर्मुख ही है । इस प्रकार परं- पुरुष की चतुर्मुखता निश्चित हो जाने पर, अजरत्व आदि गुणों का प्रति- पादन भी उन्हीं के लिए किसी न किसी प्रकार करना होगा । सिद्धान्तः-इति प्राप्ते प्रचक्ष्महे-“ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्तः” ईक्षति कर्म सः परमात्मा । कुतः ? व्यपदेशात्-व्यपदिश्यते हीक्षतिकर्म परमात्मत्वेन । तथाहि ईक्षतिकर्मविषयतोदाहृते श्लोके-“तमोङ्का- रेणैवायनेनान्