श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८२] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ४०१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नागशत्रुर्हिरण्याङ्गो वैनतेयः प्रभञ्जनः।<br>नागाशीर्विषनाशश्च विष्णुवाहन एव च॥ ६३<br>एते हिरण्यवर्णाभा गरुडा विष्णुवाहनाः।<br>नानाभरणसम्पन्ना व्यपोहन्तु मलं मम॥ ६४ | आसुरी भावको दूर करें। गरुत्मान्, खगति, पक्षिराट्, नागमर्दन, नागशत्रु, हिरण्यांग, वैनतेय, प्रभंजन, नागाशी, विषनाश, विष्णुवाहन—ये सुवर्णके रंगवाले तथा अनेकविध आभूषणोंसे युक्त विष्णुवाहन गरुड़ मेरे पापको दूर करें॥ ६३—६४॥ |
| अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च अङ्गिरा भृगुरेव च।<br>काश्यपो नारदश्चैव दधीचश्च्यवनस्तथा॥ ६५<br>उपमन्युस्तथान्ये च ऋषयः शिवभाविताः।<br>शिवार्चनरताः सर्वे व्यपोहन्तु मलं मम॥ ६६ | अगस्त्य, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, काश्यप, नारद, दधीच, च्यवन, उपमन्यु—ये तथा अन्य शिवभक्त और शिवार्चनपरायण समस्त ऋषि मेरे पापको दूर करें॥ ६५-६६॥ |
| पितरः पितामहाश्च तथैव प्रपितामहाः।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदस्तथा मातामहादयः॥ ६७<br>व्यपोहन्तु भयं पापं शिवध्यानपरायणाः।<br>लक्ष्मीश्च धरणी चैव गायत्री च सरस्वती॥ ६८<br>दुर्गा उषा शची ज्येष्ठा मातरः सुरपूजिताः।<br>देवानां मातरश्चैव गणानां मातरस्तथा॥ ६९<br>भूतानां मातरः सर्वा यत्र या गणमातरः।<br>प्रसादाद्देवदेवस्य व्यपोहन्तु मलं मम॥ ७० | शिवके ध्यानमें तल्लीन रहनेवाले पिता, पितामह, प्रपितामह, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् तथा मातामह आदि [मेरे] भय तथा पापको दूर करें। लक्ष्मी, धरणी, गायत्री, सरस्वती, दुर्गा, उषा, शची तथा ज्येष्ठा—ये देवपूजित माताएँ, देवताओंकी माताएँ, गणोंकी माताएँ, भूतोंकी माताएँ तथा अन्य जो भी गणमाताएँ जहाँ-कहीं भी हों—वे सब देवदेव [शिव]-के अनुग्रहसे मेरे पापको दूर करें॥ ६७-७०॥ |
| उर्वशी मेनका चैव रम्भारतिस्तिलोत्तमा।<br>सुमुखी दुर्मुखी चैव कामुकी कामवर्धनी॥ ७१<br>तथान्याः सर्वलोकेषु दिव्याश्चाप्सरसस्तथा।<br>शिवाय ताण्डवं नित्यं कुर्वन्त्योऽतीव भाविताः॥ ७२<br>देव्यः शिवार्चनरता व्यपोहन्तु मलं मम। | अत्यन्त भक्तियुक्त होकर शिवके लिये नित्य ताण्डव [नृत्य] करनेवाली तथा शिवार्चनमें रत रहनेवाली उर्वशी, मेनका, रम्भा, रति, तिलोत्तमा, सुमुखी, दुर्मुखी, कामुकी, कामवर्धनी—ये तथा सभी लोकोंकी अन्य दिव्य अप्सराएँ और देवियाँ मेरे पापको दूर करें॥ ७१-७२ १/२ ॥ |
| अर्कः सोमोऽङ्गारकश्च बुधश्चैव बृहस्पतिः॥ ७३<br>शुक्रः शनैश्चरश्चैव राहुः केतुस्तथैव च।<br>व्यपोहन्तु भयं घोरं ग्रहपीडां शिवार्चकाः॥ ७४<br>मेषो वृषोऽथ मिथुनस्तथा कर्कटकः शुभः।<br>सिंहश्च कन्या विपुला तुला वै वृश्चिकस्तथा॥ ७५<br>धनुश्च मकरश्चैव कुम्भो मीनस्तथैव च।<br>राशयो द्वादश ह्येते शिवपूजापरायणाः॥ ७६<br>व्यपोहन्तु भयं पापं प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी तथा॥ ७७<br>श्रीमन्मृगशिरश्चार्द्रा पुनर्वसुपुष्यसार्पकाः।<br>मघा वै पूर्वफाल्गुन्य उत्तराफाल्गुनी तथा॥ ७८<br>हस्तश्चित्रा तथा स्वाती विशाखा चानुराधिका।<br>ज्येष्ठा मूलं महाभागा पूर्वाषाढा तथैव च॥ ७९<br>उत्तराषाढिका चैव श्रवणं च श्रविष्ठिका।<br>शतभिषक्पूर्वभद्रा च तथा प्रोष्ठपदा तथा॥ ८०<br>पौष्णं च देव्यः सततं व्यपोहन्तु मलं मम। | शिवका अर्चन करनेवाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु [मेरे] घोर भय तथा ग्रहकष्टका निवारण करें। मेष, वृष, मिथुन, शुभ कर्क, सिंह, कन्या, विशद तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ तथा मीन—ये बारह शिवपूजापरायण राशियाँ महेश्वरकी कृपासे [मेरे] भय तथा पापको दूर करें। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, श्रीयुक्त मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, महाभाग पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद तथा रेवती—ये देवियाँ निरन्तर मेरे पापको दूर करें॥ ७३—८० १/२॥ |
| ज्वरः कुम्भोदरश्चैव शङ्कुकर्णो महाबलः॥ ८१ | ज्वर, कुम्भोदर, शंकुकर्ण, महाबल, महाकर्ण, |