भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 624, कुल 834 में से

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पृष्ठ 624

| ६२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टौ प्रकृतयो देव्या मूर्त्तयः परिकीर्त्तिताः।<br>तथा विकृतयस्तस्या देहबद्धविभूतयः ॥ २२<br><br>विस्फुलिङ्गा यथा तावदग्नौ च बहुधा स्मृताः।<br>जीवाः सर्वे तथा शर्वे द्वन्द्वसत्त्वमुपागताः ॥ २३<br><br>गौरीरूपाणि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्।<br>शरीरिणस्तथा सर्वे शङ्करांशा व्यवस्थिताः ॥ २४<br><br>श्राव्यं सर्वमुमारूपं श्रोता देवो महेश्वरः।<br>विषयित्वं विभुर्धत्ते विषयात्मकतामुमा ॥ २५<br><br>स्रष्टव्यं वस्तुजातं तु धत्ते शङ्करवल्लभा।<br>स्रष्टा स एव विश्वात्मा बालचन्द्रार्धशेखरः ॥ २६<br><br>दृश्यवस्तु प्रजारूपं बिभर्ति भुवनेश्वरी।<br>द्रष्टा विश्वेश्वरो देवः शशिखण्डशिखामणिः ॥ २७हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है। वह शक्ति विश्वेश्वरी देवी उमा ही हैं और वह समस्त पदार्थ भगवान् महेश्वर ही हैं। शक्तिसे युक्त जो भी पदार्थ हैं, वे सब महेश्वर शिवरूप हैं। आठों प्रकृतियाँ देवीकी मूर्तियाँ हैं और सभी विकृतियाँ उनकी देहबद्ध विभूतियाँ कही गयी हैं। जैसे अग्निमें अनेक विस्फुलिङ्ग बताये गये हैं, वैसे ही द्वन्द्वसत्त्वको प्राप्त शिवमें सभी जीव स्थित हैं। जीवोंके समस्त शरीर गौरीरूप हैं और समस्त जीव शंकरके अंशरूपसे उनमें व्यवस्थित हैं। श्रवणके योग्य सब कुछ उमाका रूप है और उसके श्रोता भगवान् महेश्वर हैं। शिव विषयका आस्वादकत्व धारण करते हैं और पार्वती विषयात्मकता धारण करती हैं। शंकरप्रिया पार्वती सृजन करनेयोग्य सभी वस्तुओंको धारण करती हैं और अर्धबालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे विश्वात्मा ही उनके स्रष्टा हैं। भुवनेश्वरी उमा समस्त प्रजारूप दृश्य वस्तुओंको धारण करती हैं और चन्द्रखण्डको सिरपर धारण करनेवाले भगवान् विश्वेश्वर उनके द्रष्टा हैं॥ १९–२७॥
रसजातमुमारूपं घ्रेयजातं च सर्वशः।<br>देवो रसयिता शम्भुर्घाता च भुवनेश्वरः ॥ २८<br><br>मन्तव्यवस्तुतां धत्ते महादेवी महेश्वरी।<br>मन्ता स एव विश्वात्मा महादेवो महेश्वरः ॥ २९<br><br>बोद्धव्यं वस्तुरूपं च बिभर्ति भववल्लभा।<br>देवः स एव भगवान् बोद्धा बालेन्दुशेखरः ॥ ३०<br><br>पीठाकृतिरुमा देवी लिङ्गरूपश्च शङ्करः।<br>प्रतिष्ठाप्य प्रयत्नेन पूजयन्ति सुरासुराः ॥ ३१<br><br>ये ये पदार्था लिङ्गाङ्कास्ते ते शर्वविभूतयः।<br>अर्था भगाङ्किता ये ये ते ते गौर्या विभूतयः ॥ ३२<br><br>स्वर्गपाताललोकान्तब्रह्माण्डावरणाष्टकम् ।<br>ज्ञेयं सर्वमुमारूपं ज्ञाता देवो महेश्वरः ॥ ३३<br><br>बिभर्ति क्षेत्रतां देवी त्रिपुरान्तकवल्लभा।<br>क्षेत्रज्ञत्वमथो धत्ते भगवानन्धकान्तकः ॥ ३४सम्पूर्ण रस उमारूप है और शम्भु रस ग्रहण करनेवाले हैं; सूँघनेयोग्य वस्तुसमूह उमारूप है और शिव उसके घ्राता हैं। महादेवी महेश्वरी माननेयोग्य वस्तुता (भाव)-को धारण करती हैं और वे विश्वात्मा महादेव महेश्वर उसका मनन करनेवाले हैं। शिवप्रिया पार्वती बोध करनेयोग्य वस्तुओंको धारण करती हैं और बालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे भगवान् शिव उनके बोद्धा हैं। उमा पीठाकृति (जलहरी) हैं और शिव [उसमें स्थित] लिङ्गरूप हैं। देवता तथा दानव लिङ्ग तथा वेदीके रूपमें स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करते हैं। जो-जो पदार्थ पुरुषचिह्नोंवाले हैं, वे शिवकी विभूतियाँ हैं और जो-जो पदार्थ स्त्रीचिह्नोंवाले हैं, वे गौरीकी विभूतियाँ हैं। स्वर्गसे पाताललोकपर्यन्त आठ आवरणोंवाले ब्रह्माण्डमें जो भी जाननेयोग्य है, वह सब उमारूप है और उसके ज्ञाता भगवान् महेश्वर हैं। त्रिपुराका नाश करनेवाले शिवकी प्रिया देवी [पार्वती] क्षेत्रता (लिङ्गशरीररूपता)-को धारण करती हैं और अन्धकका संहार करनेवाले भगवान् [शिव] क्षेत्रज्ञत्व (जीवरूपत्व)-को धारण करते हैं॥ २८–३४॥
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