भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ११] भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ६२३


श्लोकहिन्दी अर्थ
शिवलिङ्गं समुत्सृज्य यजन्ते चान्यदेवताः।<br>स नृपः सह देशेन रौरवं नरकं व्रजेत्॥ ३५<br><br>शिवभक्तो न यो राजा भक्तोऽन्येषु सुरेषु यः।<br>स्वपतिं युवतिस्त्यक्त्वा यथा जारेषु राजते॥ ३६<br><br>ब्रह्मादयः सुराः सर्वे राजानश्च महर्द्धिकाः।<br>मानवा मुनयश्चैव सर्वे लिङ्गं यजन्ति च॥ ३७<br><br>विष्णुना रावणं हत्वा ससैन्यं ब्रह्मणः सुतम्।<br>स्थापितं विधिवद्भक्त्या लिङ्गं तीरे नदीपतेः॥ ३८[जिस राजाके राज्यमें] लोग शिवलिङ्गको छोड़कर अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वह राजा अपने देशसहित रौरव नरकमें जाता है। जो राजा शिवभक्त नहीं है और अन्य देवताओंके प्रति भक्तिपरायण रहता है, वह वैसे ही है, जैसे कोई युवती अपने पतिको छोड़कर परपुरुषोंमें आसक्ति रखती है। ब्रह्मा आदि सभी देवता, बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली राजा, मनुष्य तथा मुनिगण शिवलिङ्गकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने [रामावतारमें] सेनासहित ब्राह्मणपुत्र रावणका संहार करके समुद्रके तटपर विधिपूर्वक शिवलिङ्गकी स्थापना की थी॥ ३५—३८॥
कृत्वा पापसहस्त्राणि हत्वा विप्रशतं तथा।<br>भावात्समाश्रितो रुद्रं मुच्यते नात्र संशयः॥ ३९<br><br>सर्वे लिङ्गमया लोकाः सर्वे लिङ्गे प्रतिष्ठिताः।<br>तस्मादभ्यर्चयेल्लिङ्गं यदिच्छेच्छाश्वतं पदम्॥ ४०<br><br>सर्वाकारौ स्थितावेतौ नरैः श्रेयोऽर्थिभिः शिवौ।<br>पूजनीयौ नमस्कार्यौ चिन्तनीयौ च सर्वदा॥ ४१हजारों पाप करके तथा सैकड़ों विप्रोंका वध करके भी जो भक्तिपूर्वक रुद्रका आश्रय ग्रहण करता है, वह मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। समस्त लोक लिङ्गमय है और सभी लिङ्गमें ही स्थित हैं; अतः यदि कोई शाश्वत पदकी इच्छा रखता हो, तो उसे शिवलिङ्गका पूजन अवश्य करना चाहिये। अपने कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्योंको सर्वरूपमें स्थित इन दोनों (शिव-पार्वती)-का सर्वदा पूजन, नमस्कार और चिन्तन करना चाहिये॥ ३९—४१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवविभूतिमहिमवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवविभूतिमहिमावर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥