श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६७१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विकरणीबलविकरणीबलप्रमथनीसर्वभूतदमनीः<br>केसरेषु कर्णिकायां मनोन्मनीमपि ध्यात्वा॥ १३ | केसरोंमें वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी और सर्वभूतदमनीका तथा उसकी कर्णिकामें मनोन्मनी शक्तिका भी ध्यान करे॥ १२-१३॥ |
| आसनं परिकल्प्यैवं सर्वोपचारसहितं बहिर्योगोप-<br>चारेणान्तःकरणं कृत्वा नाभौ वह्निकुण्डे पूर्ववदासनं<br>परिकल्प्य सदाशिवं ध्यात्वा बिन्दुतोऽमृतधारां<br>शिवमण्डले निपतितां ध्यात्वा ललाटे महेश्वरं<br>दीपशिखाकारं ध्यात्वा आत्मशुद्धिरित्थं प्राणापानौ<br>संयम्य सुषुम्णया वायुं व्यवस्थाप्य षष्ठेन तालुमुद्रां<br>कृत्वा दिग्बन्धं कृत्वा षष्ठेन स्थानशुद्धिर्वस्त्रादि-<br>दिपूतान्तरर्घ्यपात्रादिषु प्रणवेन तत्त्वत्रयं विन्यस्य<br>तदुपरि बिन्दुं ध्यात्वा त्वम्भसा विपूर्य द्रव्याणि च<br>विधाय अमृतप्लावनं कृत्वा पाद्यपात्रादिषु<br>तेषामर्घ्यवदासनं परिकल्प्य संहितयाभिमन्त्र्या-<br>द्येनाभ्यर्च्य द्वितीयेनामृतीकृत्वा तृतीयेन विशोध्य<br>चतुर्थेनावगुण्ठ्य पञ्चमेनावलोक्य षष्ठेन रक्षां<br>विधाय चतुर्थेन कुशपुञ्जेनार्घ्याम्भसाभ्युक्ष्य<br>आत्मानमपि द्रव्याणि पुनरर्घ्याम्भसाभ्युक्ष्य सपुष्पेण<br>सर्वद्रव्याणि पृथक्पृथक् शोधयेत्॥ १४ | बहिर्योगके उपचारसे अन्तःकरण सामग्री करके पूर्वोक्त प्रकारसे समस्त उपचारसहित आसन कल्पितकर नाभिमें वह्निकुण्डके मध्य पूर्वकी भाँति आसन परिकल्पित करके उसके ऊपर सदाशिवका चिन्तनकर ललाटमें दीपशिखाके आकारवाले महेश्वरका ध्यान करके बिन्दुसे शिवमण्डलमें गिरती हुई अमृतधाराका ध्यान करे—इस रूपसे आत्मशुद्धि होती है। प्राण तथा अपानको संयमित करके सुषुम्णाद्वारा वायुको व्यवस्थितकर षष्ठ मन्त्रसे खेचरी मुद्रा बनाकर षष्ठ मन्त्रसे ही दिग्बन्ध करे—इस प्रकारसे शरीरशुद्धि होती है। तदनन्तर वस्त्र आदिके द्वारा सम्यक् पोंछकर पवित्र किये गये अर्घ्यपात्र आदिमें प्रणवके द्वारा तत्त्वत्रयका न्यास करके उनके ऊपर बिन्दुका ध्यानकर जलसे पूर्ण करके पूजाद्रव्योंको व्यवस्थितकर अमृतप्लावन करके पाद्यपात्रोंमें तत्त्व आदिके लिये अर्घ्यकी भाँति आसनकी कल्पना करे; तत्पश्चात् संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके प्रथम मन्त्रसे उनका अभ्यर्चन, द्वितीय मन्त्रसे अमृतीकरण, तृतीय मन्त्रसे विशोधन, चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन, पंचम मन्त्रसे अवलोकन और षष्ठ मन्त्रसे रक्षाविधान करे, इसके बाद चतुर्थ मन्त्रसे कुशकूर्चके द्वारा अपने ऊपर तथा द्रव्योंके ऊपर भी अर्घ्यजलसे अभ्युक्षण करके पुनः पुष्पयुक्त अर्घ्यजलसे सभी द्रव्योंका पृथक्-पृथक् शोधन करे॥ १४॥ |
| सद्येन गन्धं वामेन वस्त्रम्। अघोरेण आभरणं पुरुषेण<br>नैवेद्यम्। ईशानेन पुष्पाणि अथाभिमन्त्रयेत्॥ १५ | तत्पश्चात् सद्योजातमन्त्रसे गन्धको, वामदेवमन्त्रसे वस्त्रको, अघोरमन्त्रसे आभरणको, तत्पुरुषमन्त्रसे नैवेद्यको और ईशानमन्त्रसे पुष्पोंको अभिमन्त्रित करना चाहिये; |
| शिवगायत्र्या शेषं प्रोक्षयेत्॥ १६ | शिवगायत्रीसे शेष अन्य द्रव्योंका प्रोक्षण करना चाहिये। |
| पञ्चामृतपञ्चगव्यादीनि ब्रह्माङ्गमूलाद्यैरभिमन्त्रयेत्॥ १७ | पंचामृत, पंचगव्य आदि पदार्थोंके ब्रह्ममन्त्र, अंगमन्त्र, मूलमन्त्र (पंचाक्षर बीजमन्त्र) आदिसे अभिमन्त्रित करना चाहिये। पुनः पृथक्-पृथक् उन गन्ध आदि |
| पृथक्पृथङ्भूलेनार्घ्यं धूपं दत्त्वाचमनीयं च तेषामपि | पूजोपचारोंको मूलमन्त्रके द्वारा अर्घ्य, धूप, आचमनीय |