श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ८७ |
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(सब हँसे।) और पैरों में बूट-जूता, सीटी बजाकर गाना – ये सब आ जाते हैं। और पण्डित संस्कृत पढ़े तो श्लोक आवृत्ति करने लगता है! मन को यदि कुसंग में रखो तो वैसी ही बातचीत, वैसी ही चिन्ता हो जाएगी। यदि भक्तों के साथ रखो तो ईश्वरचिन्तन, भगवत्प्रसंग – ये सब होंगे।
“मन ही को लेकर सब कुछ है। एक ओर स्त्री है और एक ओर सन्तान। स्त्री को एक भाव से और सन्तान को दूसरे भाव से प्यार करता है, किन्तु है एक ही मन।”
(६)
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (गीता, १८।६६)
ईसाई धर्म, ब्राह्मसमाज और पापवाद
श्रीरामकृष्ण (ब्राह्मभक्तों के प्रति) – मन ही में बन्धन है और मन ही में मुक्ति। मैं मुक्तपुरुष हूँ; चाहे संसार में रहूँ, चाहे अरण्य में, मुझे बन्धन कैसा? मैं ईश्वर की सन्तान हूँ; राजाधिराज का बेटा; मुझे भला कौन बाँध सकता है? साँप के काटने पर यदि दृढ़ता के साथ यह कहा जाय कि 'विष नहीं है' तो सचमुच विष उतर जाता है! उसी प्रकार दृढ़ता के साथ यह कहते कहते कि 'मैं बद्ध नहीं, मैं मुक्त हूँ', वास्तव में वैसा ही हो जाता है। मनुष्य मुक्त ही हो जाता है।
“किसी ने ईसाइयों की एक किताब दी थी; मैंने पढ़कर सुनाने के लिए कहा। उसमें केवल 'पाप' 'पाप' ही भरा था। (केशव के प्रति) तुम्हारे ब्राह्मसमाज में भी केवल 'पाप' 'पाप' ही सुनायी देता है। जो व्यक्ति बार बार 'मैं बद्ध हूँ' 'मैं बद्ध हूँ' कहता रहता है वह बद्ध ही हो जाता है, जो दिन-रात 'मैं पापी हूँ' 'मैं पापी हूँ' यही रटता रहता है, वह सचमुच पापी ही बन जाता है।
“ईश्वर के नाम पर इस प्रकार का ज्वलन्त विश्वास होना चाहिए – ‘क्या! मैंने उनका नाम लिया है, अब भी मुझमें पाप रह सकता है! मुझमें भला पाप कैसा! मुझे भलाबन्धन कैसा!’ कृष्णकिशोर सनातनी हिन्दू था – सदाचारनिष्ठ ब्राह्मण! एक बार वह वृन्दावन गया था। एक दिन घूमते घूमते उसे प्यास लगी। उसने एक कुएँ के पास जाकर देखा, एक आदमी खड़ा है। उसने उससे कहा, ‘क्यों रे तू मुझे एक लोटा पानी पिला सकता है? तू कौन जात है?’ वह बोला, ‘महाराज, मैं नीची जाति का हूँ – चमार हूँ।’ कृष्णकिशोर ने कहा, ‘तू शिव शिव कह। ले, अब पानी खींच दे।’
“भगवान् का नाम लेने से मनुष्य का शरीर, मन – सब कुछ शुद्ध हो जाता है।
“केवल ‘पाप’ ‘नरक’ यही सब बातें क्यों? एक बार कहो कि जो कुछ अयोग्य काम किए हैं, उन्हें फिर नहीं करूँगा, और उनके नाम पर विश्वास रखो।”