श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २७ अक्तूबर, १८८२ |
|---|
श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर नाममाहात्म्य गाने लगे –
(भावार्थ) – “दुर्गा दुर्गा अगर जपूँ मैं जब मेरे निकलेंगे प्राण।
देखूँ कैसे नहीं तारती, कैसे हो करुणा की खान।।”
“मैंने माँ के निकट केवल भक्ति माँगी थी। हाथ में फूल लेकर माँ के पादपद्मों में चढ़ाया था; कहा था, 'माँ, यह लो तुम्हारा पाप, यह लो तुम्हारा पुण्य, मुझे शुद्ध भक्ति दो; यह लो तुम्हारा ज्ञान, यह लो तुम्हारा अज्ञान, मुझे शुद्ध भक्ति दो; यह लो तुम्हारी शुचिता, यह लो तुम्हारी अशुचिता, मुझे शुद्ध भक्ति दो; यह लो तुम्हारा धर्म, यह लो तुम्हारा अधर्म, मुझे शुद्ध भक्ति दो।'
(ब्राह्मभक्तों के प्रति) – “एक रामप्रसाद का गीत सुनो –
(भावार्थ) – “चल मन घूमने चलें। कालीरूपी कल्पतरु के नीचे तुझे (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) चारों फल पड़े मिल जाएँगे। अपनी प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दो पत्नियों में से तू केवल निवृत्ति को ही साथ ले। उसके विवेक नामक बेटे से तत्त्वज्ञान की बातें पूछना। शुचि अशुचि दोनों को साथ लेकर तू दिव्यगृह में कब सोएगा ? जब इन दो सौतों में प्रीति स्थापित होगी तभी तू श्यामा माँ को पाएगा। अहंकार और अविद्या तेरे पिता और माता हैं – दोनों को भगा दे। यदि मोह तुझे पकड़कर खींचे तो तू धैर्यरूपी खूँटे को पकड़े रह। धर्म अधर्म इन दो बकरों को उपेक्षारूपी खूँटी से बाँधे रख। यदि वे नहीं मानें तो ज्ञानखड्ग के द्वारा उनका बलिदान कर देना। प्रवृत्ति नामक पहली पत्नी की सन्तानों को दूर ही से समझाना। यदि वे न मानें तो उन्हें ज्ञानसिन्धु में डुबो देना। रामप्रसाद कहता है, ऐसा करने पर तू यम को सही जवाब दे सकेगा और तभी तू सच्चा मन होगा।”
गाना समाप्त कर श्रीरामकृष्ण बोले – “संसार में रहकर ईश्वरलाभ क्यों नहीं होगा ? जनक राजा को हुआ था। रामप्रसाद ने कहा था, यह संसार 'धोखे की जगह' है। परन्तु ईश्वर के चरणकमलों में भक्ति होने पर –
“ 'यह संसार मौज की जगह है। मैं यहाँ खाता, पीता और मौज उड़ाता हूँ। जनक राजा महातेजस्वी था, उसकी किसी बात में कसर नहीं थी। उसने यह और वह – दोनों बाजू सम्हालकर दूध का प्याला पिया था।' (सब हँसने लगे)
गृहस्थ के लिए उपाय – एकान्तवास तथा विवेक
“परन्तु कोई एकदम फट से जनक राजा नहीं बन जाता। जनक राजा ने निर्जन में बहुत तपस्या की थी। संसार में रहते हुए भी बीच बीच में एकान्तवास करना चाहिए। गृहस्थी से बाहर निकलकर एकान्त में अकेले रहकर अगर भगवान् के लिए तीन दिन ही रोया जाय तो वह भी अच्छा है। यहाँ तक कि यदि अवसर पाकर एक ही दिन निर्जन में रहकर भगवच्चिन्तन किया जाए तो वह भी अच्छा है। लोग स्त्री-पुत्रों के लिए रोकर लोटाभर आँसू