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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 149

१२६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १४ दिसम्बर १८८२

अहंकार कब जाता है? – ब्रह्मज्ञान की अवस्था सप्तभूमि

“ज्ञानलाभ होने से अहंकार दूर हो सकता है। ज्ञानलाभ होने से समाधि होती है। जब समाधि होती है, तभी अहंकार जाता है। ऐसा ज्ञानलाभ बड़ा कठिन है।

“वेदों में कहा है कि मन सप्तम भूमि पर जाने से समाधि होती है। समाधि होने से ही अहंकार दूर हो सकता है। मन प्रायः प्रथम तीन भूमियों में रहता है। लिंग, गुदा और नाभि ये ही वे तीन भूमियाँ हैं। तब मन संसार की ओर – कामिनी-कांचन की ओर खिंचा रहता है। जब मन हृदय में रहता है तब ईश्वरी ज्योति के दर्शन होते हैं। वह मनुष्य ज्योति देखकर कह उठता है – ‘यह क्या, यह क्या है!’ इसके बाद मन कण्ठ में आता है। तब केवल ईश्वर की ही चर्चा करने और सुनने की इच्छा होती है। कपाल या भौंहों के बीच में जब मन आता है तब सच्चिदानन्द-रूप दीख पड़ता है। उस रूप को गले लगाने और उसे छूने की इच्छा होती है, परन्तु छुआ नहीं जाता। लालटेन के भीतर की बत्ती को कोई चाहे देख ले पर उसे छू नहीं सकता, जान पड़ता है कि छू लिया, परन्तु छू नहीं पाता। जब सप्तम भूमि पर मन जाता है तब अहं नहीं रह जाता, समाधि होती है।”

विजय – वहाँ पहुँचने पर जब ब्रह्मज्ञान होता है, तब मनुष्य क्या देखता है?

श्रीरामकृष्ण – सप्तम भूमि में मन के जाने पर क्या होता है, मुँह से नहीं कहा जा सकता। नमक की गुड़िया समुंदर नापने गई। किन्तु जैसे पानी में उतरी वैसेही गल गई अब समुंदर के गहराई की खबर कौन देगी? जो देगी वही तो उसके साथ मिल गई। सप्तम भूमि में मन का नाश होता है, समाधि होती है। क्या अनुभव होता है वह मुँह से कहा नहीं जाता।

‘अहं’ जाता नहीं है। ‘बदमाश मैं।’ ‘दास मैं।’

“जो ‘मैं’ संसारी बनता है, कामिनी-कांचन में फँसता है, वह बदमाश ‘मैं’ है। जीव और आत्मा में भेद सिर्फ इसलिए है कि बीच में यह ‘मैं’ जुड़ा हुआ है। पानी पर अगर लाठी डाल दी जाए तो पानी दो हिस्सों में बँटा हुआ दीख पड़ता है। परन्तु वास्तव में है वह एक ही पानी; लाठी के कारण उसके दो हिस्से नजर आते हैं।

“यह लाठी ‘अहं’ ही है। लाठी उठा लो, वही एक जल रह जायगा।

“‘बदमाश मैं’ वह है जो कहता है, ‘मुझे नहीं जानते हो! मेरे इतने रुपये हैं, क्या मुझसे भी कोई बड़ा आदमी है?’ यदि किसी ने दस रुपये चुरा लिये तो पहले वह चोर से रुपये छीन लेता है, फिर चोर की ऐसी मरम्मत करता है कि पसली पसली ढीली कर देता है; इतने पर भी उसको नहीं छोड़ता, पहरेवाले के हाथ सौंपता है और सजा दिलवाता है! ‘बदमाश मैं’ कहता है, ‘अरे, इसने मेरे दस रुपये चुराये थे, उफ, इतनी हिम्मत!’”

विजय – यदि बिना ‘अहं’ के दूर हुए सांसारिक भोगों से पिण्ड नहीं छूटने का –