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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२७

समाधि नहीं होने की, तो ज्ञानमार्ग पर आना ही अच्छा है, क्योंकि उससे समाधि होगी। यदि भक्तियोग में 'अहं' रह जाता है तो ज्ञानयोग ही अच्छा ठहरा।

श्रीरामकृष्ण – समाधि प्राप्त होकर एक दो मनुष्यों का अहंकार जाता है अवश्य, परन्तु प्रायः नहीं जाता। लाख विचार करो, पर देखना कि 'अहं' घूम-घामकर फिर उपस्थित है। आज बरगद का पेड़ काट डालो, कल सुबह को उसमें अंकुर निकला हुआ ही देखोगे। ऐसी दशा में यदि 'मैं' नहीं दूर होने का तो रहने दो साले को 'दास मैं' बना हुआ। 'हे ईश्वर! तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ' इसी भाव में रहो। 'मैं दास हूँ', 'मैं भक्त हूँ' ऐसे 'मैं' में दोष नहीं। मिठाई खाने से अम्लशूल होता है, पर मिश्री मिठाइयों में नहीं गिनी जाती।

“ज्ञानयोग बड़ा कठिन है। देहात्मबुद्धि का नाश हुए बिना ज्ञान नहीं होता। कलियुग में प्राण अन्नगत है, अतएव देहात्मबुद्धि, अहंबुद्धि नहीं मिटती। इसलिए कलियुग के लिए भक्तियोग है। भक्तिपथ सीधा पथ है। हृदय से व्याकुल होकर उनके नाम का स्मरण करो, उनसे प्रार्थना करो, भगवान् मिलेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।

“मानो जलराशि पर बिना बाँस रखे ही एक रेखा खींची गयी है, मानो जल के दो भाग हो गये हैं; परन्तु वह रेखा बड़ी देर तक नहीं रहती। 'दास मैं' या 'भक्त का मैं' अथवा 'बालक का मैं' ये सब 'मैं' की रेखाएँ मात्र हैं।”

(७)

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥ (गीता, १२।५)

भक्तियोग ही युगधर्म है। ज्ञानयोग की विशेष कठिनता

'दास मैं' – 'भक्त मैं' और 'बालक मैं'

विजय – महाराज, आप 'बदमाश मैं' को दूर करने के लिए कहते हैं, तो क्या 'दास मैं' में दोष नहीं?

श्रीरामकृष्ण – नहीं। 'दास मैं' अर्थात् 'मैं ईश्वर का दास हूँ', 'मैं उनका भक्त हूँ' इस अभिमान में दोष नहीं, बल्कि इससे भगवान् मिलते हैं।

विजय – अच्छा, तो 'दास मैं' वाले के काम-क्रोधादि कैसे होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – अगर उसके भाव में पूरी सच्चाई आ जाय तो काम-क्रोधादि का आकार मात्र रह जाता है। यदि ईश्वरलाभ के बाद भी किसी का 'दास मैं' या 'भक्त मैं' बना रहा तो वह मनुष्य किसी का अनिष्ट नहीं कर सकता। पारस पत्थर छू जाने पर तलवार सोना हो जाती है; तलवार का स्वरूप तो रहता है, पर वह किसी की हिंसा नहीं करती।

“नारियल के पेड़ का पत्ता झड़ जाता है, उसकी जगह सिर्फ दाग बना रहता है,