श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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१२८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १४ दिसम्बर १८८२
जिससे यह समझ लिया जाता है कि कभी यहाँ पत्ता लगा हुआ था। इसी तरह जिसको ईश्वर मिल गये हैं उसके अहंकार का चिह्न भर रह जाता है, काम-क्रोध का स्वरूप मात्र रह जाता है, उसकी बालक जैसी अवस्था हो जाती है। बालक सत्व, रज, तम में से किसी गुण के बंधन में नहीं आता। बालक जितनी जल्दी किसी वस्तु पर अड़ जाता है, उतनी ही जल्दी वह उसे छोड़ भी देता है। एक पाँच रुपये की कीमत का कपड़ा चाहे तुम धेले के खिलौने पर रिझाकर फुसला लो। पहले तो वह बहककर कहेगा, 'नहीं, मैं न दूँगा, मेरे बाबूजी ने मोल ले दिया है।' और लड़के के लिए सभी बराबर हैं। ये बड़े हैं, यह छोटा है, यह ज्ञान उसे नहीं; इसीलिए उसे जाति-पाँति का विचार भी नहीं है। माँ ने कह दिया है, 'वह तेरा दादा है', फिर चाहे वह कलार हो, वह उसी के साथ बैठकर रोटी खाता है। बालक को घृणा नहीं, शुचि और अशुचि पर ध्यान नहीं, शौच के लिए जाकर हाथ नहीं मटियाता।
“कोई कोई समाधि के बाद भी 'भक्त का मैं', 'दास का मैं' लेकर रहते हैं। 'मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो', 'मैं भक्त हूँ, तुम भगवान् हो।' यह अभिमान भक्तों का बना रहता है। ईश्वरलाभ के बाद भी रहता है। सम्पूर्ण 'मैं' नहीं दूर होता। और फिर इसी अभिमान का अभ्यास करते करते ईश्वर-प्राप्ति भी होती है। यही भक्तियोग है।
“भक्ति के मार्ग पर चलने से भी ब्रह्मज्ञान होता है। भगवान् सर्वशक्तिमान हैं। वे इच्छा करें तो ब्रह्मज्ञान भी दे सकते हैं। भक्त प्रायः ब्रह्मज्ञान नहीं चाहते। 'मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो', 'मैं बच्चा हूँ, तू माँ हैं' वे ऐसा अभिमान रखना चाहते हैं।”
विजय – जो लोग वेदान्त-विचार करते हैं, वे भी तो उन्हें पाते हैं?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, विचारमार्ग से भी वे मिलते हैं। इसी को ज्ञानयोग कहते हैं। विचारमार्ग बड़ा कठिन है। सप्तभूमि की बात तो तुम्हें बतलायी है। सप्तम भूमि पर मन के पहुँचने से समाधि होती है, 'ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या' यह बोध होने पर मन का लय होता है, समाधि होती है। परन्तु कलि में जीवों का प्राण अन्नगत है 'ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या' का बोध फिर कैसे हो सकता है? ऐसा बोध देहबुद्धि के बिना दूर हुए नहीं हो सकता। 'मैं न शरीर हूँ, न मन हूँ, न चौबीस तत्त्व हूँ, मैं सुख और दुःख से परे हूँ, मुझे फिर कैसा रोग, कैसा शोक, कैसी जरा, कैसी मृत्यु?' – ऐसा बोध कलिकाल में होना कठिन है। चाहे जितना विचार करो, देहात्मबुद्धि कहीं न कहीं से आ ही जाती है। बड़ के पेड़ को काट डालो, तुम तो सोचते हो कि जड़समेत उखाड़ फेंका, पर दूसरे दिन सबेरे उसमें कनखा निकला ही हुआ देखोगे! देहाभिमान नहीं दूर होता; इसीलिए कलिकाल में भक्तियोग अच्छा है, सीधा है।
“और 'मैं चीनी बन जाना नहीं चाहता, चीनी खाना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है।' मेरी कभी यह इच्छा नहीं होती कि कहूँ 'मैं ही ब्रह्म हूँ।' मैं तो कहता हूँ 'तुम भगवान् हो,
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