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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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९ मार्च, १८८३ परिच्छेद २५ १०३

प्रकार माँ की गोद में छोटा लड़का जाकर बैठता है, उसी प्रकार राखाल भी श्रीरामकृष्ण की गोद के सहारे बैठते थे। मानो स्तनपान कर रहे हों।

भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण का बान देखना

श्रीरामकृष्ण इसी भाव में बैठे हैं, इसी समय एक आदमी ने आकर समाचार दिया कि बान* आ रहा है। श्रीरामकृष्ण, राखाल, मास्टर सभी लोग बान देखने के लिए पंचवटी की ओर दौड़ने लगे। पंचवटी के नीचे आकर सभी बान देख रहे हैं। दिन के करीब साढ़े दस बजे का समय होगा। एक नौका की स्थिति को देख श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, "देखो, देखो, उस नाव की न जाने क्या दशा होगी!"

अब श्रीरामकृष्ण पंचवटी के पथ पर मास्टर, राखाल आदि के साथ बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – अच्छा, बान कैसे आता है? मास्टर भूमि पर रेखाएँ खींचकर पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, माध्याकर्षण, ज्वार-भाटा, पूर्णिमा, अमावस्या, ग्रहण आदि समझाने की चेष्टा कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – यह लो! समझ नहीं सक रहा हूँ। सिर घूम जाता है। चक्कर आ रहा है। अच्छा, इतनी दूर की बातें कैसे जान सके?

"देखो, मैं बचपन में चित्र अच्छी तरह खींच सकता था। परन्तु गणित से सिर चकराता था। हिसाब नहीं सीख सका।"

अब श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में लौट आये हैं। दीवार पर टँगे हुए यशोदा के चित्र को देख कह रहे हैं, "चित्र अच्छा नहीं हुआ। मानो ठीक मालिन मौसी है!"

अधर सेन को उपदेश

मध्याह्न के आहार के बाद श्रीरामकृष्ण ने थोड़ासा विश्राम किया। धीरे धीरे अधर तथा अन्य भक्तगण आ पहुँचे। अधर सेन पहली बार श्रीरामकृष्ण का दर्शन कर रहे हैं। अधर का मकान कलकत्ता, बेनेरोला में है। वे डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं। उम्र उनतीस-तीस वर्ष की होगी।

अधर (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – महाराज, मुझे एक बात पूछनी है। क्या देवता के सामने बलि चढ़ाना अच्छा है? इससे तो जीवहिंसा होती है!

श्रीरामकृष्ण – शास्त्र के अनुसार, मन की एक विशेष अवस्था में बलि चढ़ायी जा सकती है। 'विधिवारीय' बलि में दोष नहीं है। जैसे, अष्टमी के दिन एक बलि चढ़ाते हैं।


* बंगाल के उपसागर में ज्वार आने पर उसका बहुतसा जल गंगा में घुस जाता है और वह विशाल जलराशि बड़ी ऊँची लहर के रूप में जोरों से गर्जना करती हुई गंगा के पृष्ठभाग पर से उलटी दिशा में वेग के साथ बढ़ने लगती है। इसे 'बान' कहते हैं। (प्र.)