श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ४ जून, १८८३
"अब भी थोड़ी ही में उद्दीपना हो जाती है। राखाल जप करते समय ओठ हिलाता था। मैं उसे देखकर स्थिर नहीं रह सकता था, एकदम ईश्वर की उद्दीपना होती और विह्वल हो जाता।"
श्रीरामकृष्ण अपने प्रकृति-भाव की और भी कथाएँ कहने लगे। बोले, "मैंने एक कीर्तनिया को स्त्री-कीर्तनिया के ढंग दिखलाए थे। उसने कहा, 'आप बिलकुल ठीक कहते हैं। आपने यह सब कैसे सीखा?'" यह कहकर आप स्त्री-कीर्तनिया के ढंग का अनुकरण कर दिखलाने लगे। कोई भी अपनी हँसी न रोक सका।
(३)
श्रीरामकृष्ण 'अहेतुक कृपासिन्धु'
भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। गाढ़ी नींद नहीं, तन्द्रा-सी है। श्री मणिलाल मल्लिक ने आकर प्रणाम किया और आसन ग्रहण किया। श्रीरामकृष्ण अब भी लेटे हैं। मणिलाल बीच बीच में बातें करते हैं। श्रीरामकृष्ण अर्धनिद्रित अर्धजाग्रत अवस्था में हैं, वे किसी किसी बात का उत्तर दे देते हैं।
मणिलाल – शिवनाथ नित्यगोपाल की प्रशंसा करते हैं। कहते हैं, उनकी अच्छी अवस्था है।
श्रीरामकृष्ण अभी पूरी तरह से नहीं जागे। वे पूछते हैं, "हाजरा को वे लोग क्या कहते हैं?"
श्रीरामकृष्ण उठ बैठे। मणिलाल से भवनाथ की भक्ति के बारे में कह रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अहा, उसका भाव कैसा सुन्दर है! गाना गाते आँखें आँसुओ से भर जाती हैं। हरीश को देखते ही उसे भाव हो गया। कहता है, ये लोग अच्छे हैं। हरीश घर छोड़ यहाँ कभी कभी रहता है न, इसीलिए।
मास्टर से प्रश्न कर रहे हैं, "अच्छा, भक्ति का कारण क्या है? भवनाथ आदि बालकों की उद्दीपना क्यों होती है?" मास्टर चुप हैं।
श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि बाहर से देखने में सभी मनुष्य एक ही तरह के होते हैं। पर किसी किसी में खोए का पूर भरा होता है। पकवान के भीतर उरद का पूर भी हो सकता है और खोए का भी, पर देखने में दोनों एक-से हैं। भगवान् को जानने की इच्छा, उन पर प्रेम और भक्ति, इसी का नाम खोए का पूर है।
अब आप भक्तों को अभय देते हैं।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – कोई सोचता है कि मुझे ज्ञानभक्ति न होगी, मैं शायद बद्धजीव हूँ। श्रीगुरु की कृपा होने पर कोई भय नहीं है। बकरियों के एक झुण्ड में बाघिन कूद पड़ी थी। कूदते समय बाघिन को बच्चा पैदा हो गया। बाघिन तो मर गयी, पर वह