श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७ जून, १८८३ | परिच्छेद ४१ | २४५ |
|---|
से बँधा हुआ है। सहस्रदल-कमल पर श्रीनाथ अभय देते हुए बैठे हैं।'
"काशी में ब्राह्मण मरे या वेश्या – सभी शिव होंगे।
-"जब हरिनाम से, कालीनाम से, रामनाम से, आँखों में आँसू भर आते हैं, तब सन्ध्या-कवच आदि की कुछ भी आवश्यकता नहीं रह जाती। कर्म का त्याग हो जाता है। कर्म का फल स्पर्श नहीं करता।"
श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - "चिन्तन करने पर भाव का उदय होता है। जैसा भाव, वैसी ही प्राप्ति होती है – विश्वास ही मूल बात है। यदि चित्त काली के चरणरूपी अमृत-सरोवर में डूबा रहता है, तो फिर पूजा-होम, यज्ञ आदि का कुछ भी महत्त्व नहीं है।"
श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं -
(भावार्थ) - "'जो त्रिसन्ध्या में काली का नाम लेता है, क्या वह पूजा-सन्ध्यादि चाहता है? सन्ध्या स्वयं उसकी खोज में फिरती रहती है, पर उससे मिल नहीं पाती! यदि 'काली काली' कहते हुए मेरे प्राण निकल जाए, तो फिर गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची आदि की कौन परवाह करता है!'
"ईश्वर में मग्न हो जाने पर फिर असद्बुद्धि, पापबुद्धि नहीं रह जाती।"
तान्त्रिक भक्त – आपने कहा है 'विद्या का मैं' रहता है।
श्रीरामकृष्ण – 'विद्या का मैं', 'भक्त मैं', 'दास मैं', 'भला मैं' रहता है। 'बदमाश मैं' चला जाता है। (हँसी)
तान्त्रिक भक्त – जी महाराज, हमारे अनेक सन्देह मिट गए।
श्रीरामकृष्ण – आत्मा का साक्षात्कार होने पर सब सन्देह मिट जाते हैं।*
भक्ति का तम। सन्देह। अष्टसिद्धि
"भक्ति का तम लाओ। कहो, – जब मैंने राम का नाम लिया, काली का नाम लिया, तब यह कैसे सम्भव है कि मेरा बन्धन रहे, मेरा कर्मफल रहे?"
श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) – "माँ, यदि मैं 'दुर्गा दुर्गा' कहता हुआ मरूँ, तो हे शंकरी, देखूँगा कि अन्त में इस दीन का तुम कैसे उद्धार नहीं करतीं! माँ! गो-ब्राह्मण की, भ्रूण की तथा नारी की हत्या, सुरापान आदि पापों की रत्तीभर परवाह न कर मैं ब्रह्मपद प्राप्त कर सकता हूँ।"
श्रीरामकृष्ण फिर कहते हैं – "विश्वास, विश्वास, विश्वास! गुरु ने कह दिया है, 'राम ही सब कुछ बनकर विराजमान हैं। वही राम घट-घट में लेटा।' कुत्ता रोटी खाता जा
* भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।। – मुण्डक उपनिषद, २।२।८