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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२५० श्रीरामकृष्णवचनामृत १८ जून, १८८३

पाण्डित्य और शास्त्र

श्रीरामकृष्ण – अधिक शास्त्र पढ़ने से और भी हानि होती है।

“शास्त्र का सार जान लेना चाहिए। फिर ग्रन्थ की क्या आवश्यकता है?

“शास्त्र का सार जान लेने पर डुबकी लगानी चाहिए – ईश्वर का लाभ करने के लिए।

“मुझे माँ ने बतला दिया है कि वेदान्त का सार है – ‘ब्रह्म सत्य और जगत् मिथ्या।’ गीता का सार क्या है? दस बार ‘गीता’ शब्द कहने से जो हो वही – अर्थात् त्यागी, त्यागी।

नवद्वीप – ठीक ‘त्यागी’ नहीं बनता, ‘तागी’ होता है। फिर उसका भी अर्थ वही है। ‘तग्’ धातु और ‘घञ्’ प्रत्यय= ताग उस पर ‘इन्’ प्रत्यय लगाने पर ‘तागी’ बनता है। ‘त्यागी’ का अर्थ जो है, ‘तागी’ का भी वही है।

श्रीरामकृष्ण – गीता का सार यही है कि हे जीव, सब त्यागकर भगवान का लाभ करने के लिए साधना करो।

नवद्वीप – त्याग की ओर तो मन नहीं जाता!

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग गोस्वामी हो, तुम्हारे यहाँ देवसेवा होती है, – तुम्हारे संसार-त्याग करने पर काम नहीं चलेगा। ऐसा करने से देवसेवा कौन करेगा? तुम लोग मन से त्याग करना।

“ईश्वर ही ने लोकशिक्षा के लिए तुम लोगों को संसार में रखा है। तुम हजार संकल्प करो, त्याग नहीं कर सकोगे। उन्होंने तुम्हें ऐसी प्रकृति दी है कि तुम्हें संसार का कामकाज करना ही पड़ेगा।

“श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा – ‘युद्ध नहीं करूँगा’ यह तुम क्या कह रहे हो? इच्छा करने ही से तुम युद्ध से निवृत्त न हो सकोगे। तुम्हारी प्रकृति तुमसे युद्ध करायेगी।”

श्रीकृष्ण अर्जुन से बातें कर रहे हैं – यह कहते ही श्रीरामकृष्ण फिर समाधिस्थ हो रहे हैं। बात ही बात में सब अंग स्थिर हो गये। आँखें एकटक हो गयीं। साँस चल रही है कि नहीं – जान नहीं पड़ता।

नवद्वीप गोस्वामी, उनके लड़के और भक्तगण निर्वाक् हो यह दृश्य देख रहे हैं।

कुछ प्रकृतिस्थ हो श्रीरामकृष्ण नवद्वीप से कहते हैं –

“योग और भोग। तुम लोग गोस्वामी वंश के हो, तुम लोगों के लिए दोनों हैं।

“अब केवल प्रार्थना, हार्दिक प्रार्थना करो कि हे ईश्वर, तुम्हारी इस भुवनमोहिनी माया के ऐश्वर्य को मैं नहीं चाहता, – मैं तुम्हें चाहता हूँ।

“ईश्वर तो सब प्राणियों में हैं। फिर भक्त किसे कहते हैं? जो ईश्वर में रहता है, जिसका मन, प्राण, अन्तरात्मा – सब कुछ उसमें लीन हो गया है।”