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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२१ जुलाई, १८८३ | परिच्छेद ४६ | २६१

ज्योतिष पर तुम्हें विश्वास है?

मणि – उन लोगों के नियम के अनुसार नये आविष्कार हो सकते हैं; यूरेनस (Uranus) ग्रह की अनियमित चाल देखकर उन्होंने दूरबीन से पता लगाकर देखा कि एक नया ग्रह (Neptune) चमक रहा है। फिर उससे ग्रहण की गणना भी हो सकती है।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, सो तो होती है।

गाड़ी चल रही है – प्रायः अधर के मकान के पास आ गयी है। श्रीरामकृष्ण मणि से कहते हैं, “सत्य में रहना, तभी ईश्वर मिलेंगे।”

मणि – एक और बात आपने नवद्वीप गोस्वामी से कही थी – 'हे ईश्वर, मैं तुम्हीं को चाहता हूँ। देखना, अपनी भुवनमोहिनी माया के ऐश्वर्य से मुझे मुग्ध न करना। मैं तुम्हीं को चाहता हूँ।'

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह दिल से कहना होगा।

(२)

अधर सेन के मकान पर, कीर्तनानन्द में

श्रीरामकृष्ण अधर के मकान पर आए हैं। बैठकखाने में रामलाल, मास्टर, अधर तथा कुछ और भक्त आपके पास बैठे हुए हैं। मुहल्ले के दो-चार लोग श्रीरामकृष्ण को देखने आए हैं। राखाल के पिता कलकत्ते में रहते हैं – राखाल वहीं हैं।

श्रीरामकृष्ण (अधर के प्रति) – क्यों, राखाल को खबर नहीं दी?

अधर – जी, उन्हें खबर दी है।

राखाल के लिए श्रीरामकृष्ण को व्यग्र देखकर अधर ने राखाल को लिवा लाने के लिए एक आदमी के साथ अपनी गाड़ी भिजवा दी।

अधर श्रीरामकृष्ण के पास आ बैठे। आप के दर्शन के लिए अधर आज व्याकुल हो रहे थे। आज आपके यहाँ आने के बारे में पहले से कुछ निश्चित नहीं था। ईश्वर की इच्छा से ही आप आ पहुँचे हैं।

अधर – बहुत दिन हुए आप नहीं आए थे। मैंने आज आपको पुकारा था, – यहाँ तक कि आँखों से आँसू भी गिरे थे।

श्रीरामकृष्ण (प्रसन्न होकर हँसते हुए) – क्या कहते हो!

शाम हुई। बैठकखाने में बत्ती जलायी गयी। श्रीरामकृष्ण ने हाथ जोड़कर जगज्जननी को प्रणाम कर मन ही मन शायद मूलमन्त्र का जाप किया। अब मधुर स्वर से नाम-उच्चारण कर रहे हैं – 'गोविन्द! गोविन्द! सच्चिदानन्द! हरि बोल! हरि बोल!' आप इतना मधुर नाम-उच्चारण कर रहे हैं कि मानो मधु बरस रहा है! भक्तगण निर्वाक् होकर उस नामसुधा का पान कर रहे हैं।