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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर, १८८३

'राम राम' नाम का मधुर स्वर में उच्चारण कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (रामलाल से) – जरा गुह-निषाद की कथा तो सुनाओ। रामलाल 'भक्तमाल' से सुनाते रहे –

"श्रीरामचन्द्र जब पिता की सत्यरक्षा के लिए वन गए थे, तब उन्हें देखकर निषादराज को बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके नेत्रों से अश्रु की धारा बहने लगी; गला रुँध आया और वे काठ की बनी पुतली की तरह निःस्पन्द होकर अनिमेष दृष्टि से एकटक देखते रहे। धीरे धीरे उन्होंने श्रीरामचन्द्र के पास जाकर कहा, 'आप हमारे घर चलें।' श्रीरामचन्द्र उन्हें मित्र कहकर भर बाँह भेंटे। निषाद ने आत्मसमर्पण करते हुए कहा, 'आप मेरे मित्र हुए तो मैं भी आपको अपने प्राणों के साथ अपनी देह समर्पित करता हूँ। आप ही मेरे प्राण, धन, राज्य हैं, आप ही मेरी भक्ति, मुक्ति हैं, आप मेरे सर्वस्व हैं। आपके चरणों में मैं देहसमर्पण करता हूँ।'

"श्रीरामचन्द्र चौदह साल वन में रहेंगे और जटा-वल्कल धारण करेंगे, यह सुनकर निषादराज ने भी जटा-वल्कल धारण कर लिया। फल-मूल छोड़कर अन्य कोई भोजन उन्होंने नहीं किया। चौदह साल के बाद भी श्रीरामचन्द्र नहीं आ रहे हैं यह देखकर गुह अग्निप्रवेश करने जा रहे थे। इसी समय हनुमानजी ने आकर संवाद दिया। संवाद पाकर गुह आनन्दसागर में मग्न हो गए। श्रीरामचन्द्र और सीतामाई पुष्पक विमान पर आकर उपस्थित हो गए।

तीव्र वैराग्य तथा संसारत्याग

"भक्तवत्सल रामचन्द्र ने प्रिय भक्त गुह को देखते ही दृढ़ आलिंगन में बाँध हृदय से लगा लिया। दोनों की देह आँसुओ से तर हो गयी। निषादराज गुह धन्य हो गए। चारों ओर उनका जयजयकार होने लगा।"

भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण थोड़ा आराम कर रहे हैं। मास्टर पास बैठे हुए हैं। इसी समय श्याम डाक्टर तथा और भी कुछ आदमी आए। श्रीरामकृष्ण उठकर बैठ गए और बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – बात यह नहीं कि कर्म बराबर करते ही जाना पड़े। ईश्वरलाभ हो जाने पर कर्म फिर नहीं रह जाते। फल होने पर फूल आप ही झड़ जाते हैं।

"जिसे ईश्वरप्राप्ति हो जाती है उसके लिए सन्ध्यादि कर्म नहीं रह जाते। सन्ध्या गायत्री में लीन हो जाती है; तब गायत्री जपने से ही काम हो जाता है। और गायत्री का लय ओंकार में हो जाता है; तब गायत्री जपने की भी आवश्यकता नहीं रह जाती। तब केवल 'ॐ' कहने से ही हो जाता है। सन्ध्यादि कर्म कब तक है! – जब तक हरिनाम् या रामनाम में पुलक न हो, अश्रुधारा न बहे। धन के लिए या मुकदमा जीतने के लिए पूजा आदि कर्म