भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 422
२३ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६८३९९

गाया था – ‘जीवनसंग्राम के लिए तू तैयार हो जा, लड़ाई का सामान लेकर काल तेरे घर में प्रवेश कर रहा है।’ एक और गाना – ‘ऐ श्यामा, दोष किसी का नहीं है, मैं अपने ही हाथों द्वारा खोदे हुए गढ़े के पानी में डूबता हूँ।’

“नागा इतना ज्ञानी था, परन्तु इनका अर्थ बिना समझे ही रोने लगा था।

“इन सब गानों में कैसी यथार्थ बात हैं – नरकान्तकारी श्रीकान्त की चिन्ता करो, फिर तुम्हें भयंकर काल का भी भय न रह जाएगा।’

श्रीरामकृष्ण और विशिष्ट द्वैतवाद

“पद्मलोचन मेरे मुँह से रामप्रसाद का गाना सुनकर रोने लगा। पर था वह कितना विद्वान्!”

भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण कुछ विश्राम कर रहे हैं। जमीन पर मणि बैठे हुए हैं। नौबतखाने में शहनाई का वाद्य सुनते हुए श्रीरामकृष्ण आनन्द कर रहे हैं।

फिर मणि को समझाने लगे, ब्रह्म ही जीव-जगत् हुए हैं।

श्रीरामकृष्ण – किसी ने कहा, अमुक स्थान पर हरिनाम नहीं है। उसके कहते ही मैंने देखा, वही सब जीव हुए हैं। मानो पानी के असंख्य बुलबुले – असंख्य जलबिम्ब!

“उस देश से बर्दवान आते आते दौड़कर एक बार मैदान की ओर चला गया – यह देखने के लिए कि यहाँ के जीव किस तरह खाते हैं और रहते हैं! जाकर देखा, मैदान में चीटियाँ रेंग रही हैं! सभी जगह चैतन्यमय है!”

हाजरा कमरे में आकर जमीन पर बैठ गए।

श्रीरामकृष्ण – अनेक प्रकार के फूल – तह के तह पंखुड़ियाँ – यह भी देखा! – छोटा बिम्ब और बड़ा बिम्ब।

ईश्वरीय रूप-दर्शन की ये सब बातें कहते कहते श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो रहे हैं। कह रहे हैं, “मैं हुआ हूँ! मैं आया हूँ!”

यह बात कहकर ही एकदम समाधिस्थ हो गए। सब कुछ स्थिर हो गया।

बड़ी देर तक समाधि के आनन्द में मग्न रह लेने पर कुछ होश आ रहा है।

अब बालक की तरह हँस रहे हैं, हँस-हँसकर कमरे में टहल रहे हैं।

अद्भुत दर्शन के बाद आँखों से जैसे आनन्द-ज्योति निकलती है, श्रीरामकृष्ण की आँखों का भाव वैसा ही हो गया। सहास्य मुख, शून्य दृष्टि।

श्रीरामकृष्ण टहलते हुए कह रहे हैं –

“बटतल्ले के परमहंस को देखा था, इसी तरह हँसकर चल रहा था! – वही स्वरूप मेरा भी हो गया क्या?”

इस तरह टहलकर श्रीरामकृष्ण अपने छोटे तख्त पर जा बैठे और जगन्माता से