श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४०० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २३ दिसम्बर, १८८३ |
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बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – "खैर, मैं जानना भी नहीं चाहता! माँ, तुम्हारे पादपद्मों में मेरी शुद्धा भक्ति बनी रहे।"
(मणि से) – "क्षोभ और वासना के जाने से ही यह अवस्था होती है।"
फिर माँ से कहने लगे – "माँ, पूजा तो तुमने उठा दी, परन्तु देखो, मेरी सब वासनाएँ चली न जाएँ! माँ, परमहंस तो बालक है – बालक को माँ चाहिए या नहीं? इसलिए तुम मेरी माँ हो, मै तुम्हारा बच्चा। माँ का बच्चा माँ को छोड़कर कैसे रहे?"
श्रीरामकृष्ण ऐसे स्वर से बातचीत कर रहे हैं कि पत्थर भी पिघल जाय। फिर माँ से कह रहे हैं – "केवल अद्वैत ज्ञान! थू थू! जब तक 'मैं' रखा है, तब तक 'तुम' हो। परमहंस तो बालक है; बालक को माँ चाहिए या नही?"
मणि आश्चर्यचकित होकर श्रीरामकृष्ण की यह देवदुर्लभ अवस्था देख रहे हैं। वे सोच रहे हैं – 'श्रीरामकृष्ण अहेतुक दयासिन्धु हैं। मुझमें विश्वास उत्पन्न हो, चैतन्य जागृत हो और जीवों को शिक्षा प्राप्त हो, इसीलिए गुरुरूपी श्रीरामकृष्ण की यह परमहंस अवस्था है!'
मणि और भी सोचते हैं – 'श्रीरामकृष्ण कहते हैं, अद्वैत – चैतन्य – नित्यानन्द। अद्वैतज्ञान होने पर चैतन्य प्राप्त होता है, तभी नित्यानन्द का लाभ होता है। श्रीरामकृष्ण की केवल अद्वैतज्ञान की नहीं – नित्यानन्द की अवस्था है। जगदम्बा के प्रेम में सदा विभोर हैं – मतवाले से!'
हाजरा श्रीरामकृष्ण की यह अवस्था देख हाथ जोड़कर कहने लगे – "धन्य है! धन्य है!"
श्रीरामकृष्ण हाजरा से कह रहे हैं – "तुम्हें विश्वास कहाँ है? तुम तो यहाँ उसी तरह हो जैसे जटिला और कुटिला व्रज में थीं, – लीला की पुष्टि के लिए।"
तीसरा प्रहर हुआ। मणि अकेले देवालय के निकट निर्जन में टहल रहे हैं और श्रीरामकृष्ण की इस अद्भुत अवस्था के बारे में सोच रहे हैं। सोच रहे हैं – 'श्रीरामकृष्ण ने ऐसा क्यों कहा कि क्षोभ और वासना के जाने से ही यह अवस्था होती है? ये गुरुरूपी श्रीरामकृष्ण कौन हैं? क्या भगवान् स्वयं ही हमारे लिए देहधारण कर आए हैं? श्रीरामकृष्ण तो कहते हैं कि ईश्वरकोटि-अवतार आदि के अलावा दूसरा कोई जड़समाधि, निर्विकल्प समाधि से लौट नहीं आ सकता'