श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context| २४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ११ मार्च, १८८२ |
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था। हृदय के चले जाने के बाद से उनको कष्ट हो रहा है। कलकत्ते से मास्टर के आने पर वे उनके साथ बात करते करते श्रीराधाकान्त के मन्दिर के सामनेवाले शिव-मन्दिर की सीढ़ी पर आकर बैठे। मन्दिर देखते ही वे एकाएक भावाविष्ट हो गए हैं।
वे जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं। कह रहे हैं, “माँ, सभी कहते हैं, मेरी घड़ी ठीक चल रही है। ईसाई, हिन्दू, मुसलमान सभी कहते हैं मेरा धर्म ठीक है, परन्तु माँ, किसी की भी तो घड़ी ठीक नहीं चल रही है। तुम्हें ठीक ठीक कौन समझ सकेगा, परन्तु व्याकुल होकर पुकारने पर, तुम्हारी कृपा होने पर सभी पथों से तुम्हारे पास पहुँचा जा सकता है। माँ, ईसाई लोग गिर्जाघरों में तुम्हें कैसे पुकारते हैं, एक बार दिखा देना। परन्तु माँ, भीतर जाने पर लोग क्या कहेंगे? यदि कुछ गड़बड़ हो जाय तो? फिर लोग कालीमन्दिर में यदि न जाने दें तो फिर गिर्जाघर के दरवाजे के पास से दिखा देना।”
(३)
भक्तों के साथ भजनानन्द में - 'प्रेम की सुरा'
एक दूसरे दिन श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटी खाट पर बैठे हैं। आनन्दमयी मूर्ति है। सहास्य वदन। श्रीयुत कालीकृष्ण* के साथ मास्टर आ पहुँचे।
कालीकृष्ण जानते न थे कि उनके मित्र उन्हें कहाँ ला रहे हैं। मित्र ने कहा था, कलार की दूकान पर जाओगे तो मेरे साथ आओ। वहाँ पर एक मटकी शराब है। मास्टर ने अपने मित्र से जो कुछ कहा था, प्रणाम करने के बाद श्रीरामकृष्ण को सब कह सुनाया। वे सभी हँसने लगे।
वे बोले, “भजनानन्द, ब्रह्मानन्द, यह आनन्द ही सुरा है, प्रेम की सुरा। मानवजीवन का उद्देश्य है ईश्वर से प्रेम, ईश्वर से प्यार करना। भक्ति ही सार है। ज्ञान-विचार करके ईश्वर को जानना बहुत ही कठिन है।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाना गाने लगे जिसका आशय इस प्रकार है -
“कौन जाने काली कैसी हैं? षड्दर्शन उन्हें देख नहीं सकते। इच्छामयी वे अपनी इच्छा के अनुसार घट घट में विराजमान हैं। यह विराट् ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड जो काली के उदर में है उसे कैसा समझते हो? शिव ने काली का मर्म जैसा समझा वैसा दूसरा कौन जानता है? योगी सदा सहस्रार, मूलाधार में मनन करते हैं। काली पद्म-वन में हंस के साथ हंसी के रूप में रमण करती हैं। 'प्रसाद' कहता है, लोग हँसते हैं। मेरा मन समझता है, पर प्राण नहीं समझता - वामन होकर चन्द्रमा पकड़ना चाहता है।”
* कालीकृष्ण भट्टाचार्य - परवर्ति काल में आप विद्यासागर कालेज में संस्कृत भाषा तथा साहित्य के प्रधान अध्यापक हुए थे।