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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

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११ मार्च, १८८२ परिच्छेद ५ २५

श्रीरामकृष्ण फिर कहते हैं, “ईश्वर से प्यार करना ही जीवन का उद्देश्य है। जिस प्रकार वृन्दावन में गोपगोपीगण, राखालगण श्रीकृष्ण से प्यार करते थे। जब श्रीकृष्ण मथुरा चले गए, राखालगण उनके विरह में रो-रोकर घूमते थे।”

इतना कहकर वे ऊपर की ओर ताकते हुए गाना गाने लगे –

(भावार्थ) – “एक नये राखाल को देख आया जो नये पेड़ की टहनी पकड़े छोटे बछड़े को गोद में लिए कह रहा है, ‘कहाँ हो रे भाई कन्हैया’! फिर ‘क’ कहकर ही रह जाता है, पूरा कन्हैया मुँह से नहीं निकलता। कह रहा है, ‘कहाँ हो रे भाई’ और आँखों से आँसू की धाराएँ निकल रही हैं।”

श्रीरामकृष्ण का प्रेमभरा गाना सुनकर मास्टर की आँखों में आँसू भर आए।