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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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४६८श्रीरामकृष्णवचनामृत२३ मार्च, १८८४

विश्वास था!

“वह अपनी लड़की की ससुराल जा रहा था। रास्ते में बेल खूब फूल रहे थे और बेल के अच्छे दल भी उसे दीख पड़े। श्रीठाकुरजी की सेवा करने के लिए फूल और बेलपत्र लेकर उल्टे पाँव तीन कोस जमीन अपने घर लौट आया!

“रामलीला हो रही थी। कैकेयी ने राम को वनवास की आज्ञा दी। हलधारी का बाप भी रामलीला देखने गया था। वह बिलकुल उठकर खड़ा हो गया। जो कैकेयी बना था उसके पास पहुँचकर कहा – 'अभागिन्!' यह कहकर उसने उसके मुँह में दीया लगा देना चाहा!

“नहाने के बाद जब पानी में खड़ा होकर 'रक्तवर्णं चतुर्मुखम्' कहकर ध्यान करता था, तब उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह चलती थी।

“मेरे पिता जब खड़ाऊ पहनकर रास्ते पर चलते थे तब गाँव के दूकानदार उठकर खड़े हो जाते थे। कहते, वे आ रहे हैं!

“जब वे हलदार तालाब में नहाते थे, तब वहाँ कोई नहाने जाय, ऐसी हिम्मत किसी में न थी। लोग खबर रखते, वे नहाकर गये या नहीं।

“रघुवीर रघुवीर कहते कहते उनकी छाती लाल हो जाती थी।

“मुझे भी ऐसा ही होता था। वृन्दावन में गौओं को चरकर लौटते हुए देखकर, भाव से शरीर की वैसी ही दशा हो गयी थी।

“तब के आदमियों में बड़ा विश्वास था। ऐसी बात भी सुनने में आती है कि भगवान काली के रूप में नाच रहे हैं और साधक तालियाँ बजा रहे हैं।”

पंचवटी के कमरे में एक हठयोगी आये हुए हैं। एँड़ेदा के कृष्णकिशोर के पुत्र रामप्रसन्न और दूसरे भी कई आदमी उन हठयोगी पर बड़ी भक्ति रखते हैं। परन्तु उनके अफीम और दूध के लिए हर महीने पच्चीस रुपये का खर्च होता है। रामप्रसन्न ने श्रीरामकृष्ण से कहा था, 'आपके यहाँ तो कितने भक्त आते हैं, उनसे कुछ कह दीजियेगा; हठयोगी के लिए कुछ रुपये मिल जायँगे।'

श्रीरामकृष्ण ने कुछ भक्तों से कहा, “पंचवटी में जाकर हठयोगी को देखो, कैसा आदमी है।”

(२)

ठाकुरदादा अपने दो-एक मित्रों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण के पास आये हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। उम्र २७-२८ होगी। वराहनगर में रहते हैं। ब्राह्मण पण्डित के लड़के हैं। कथाएँ कहने का अभ्यास कर रहे हैं। अब संसार का भार ऊपर आ पड़ा है। कुछ दिन के लिए विरागी होकर घर से निकल गये थे। साधन-भजन अब भी करते हैं।


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