श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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२३ मार्च, १८८४ परिच्छेद ७८ ४७५
पर रखता है – उसका सब मन वहीं रहता है जहाँ उसके अण्डे हैं।
"कप्तान का स्वभाव अब अच्छा हो गया है। जब पूजा करने बैठता है तब बिलकुल ऋषि की तरह जान पड़ता है। इधर कपूर की आरती और बहुत ही सुन्दर स्तव पाठ करता है। पूजा करके जब उठता है, तब भाव के कारण उसकी आँखें सूज जाती हैं, मानो चींटियों ने काटा हो। और सारे समय गीता, भागवत यही सब पढ़ता रहता है। मैंने दो-चार अंग्रेजी शब्द कहे, इससे बिगड़ बैठा। कहा – अंग्रेजी पढ़नेवाले भ्रष्टाचारी होते हैं।"
कुछ देर बाद अधर ने बड़े विनीत भाव से कहा –
"हमारे यहाँ बहुत दिनों से आप नहीं पधारे हैं। बैठकखाने में मानो संसारीपन की दुर्गन्ध आती है और बाकी तो सब अँधेरा ही अँधेरा है।"
भक्त की यह बात सुनकर श्रीरामकृष्ण के स्नेह का सागर उमड़ पड़ा। भावावेश में वे उठकर खड़े हो गये। अधर और मास्टर के मस्तक और हृदय पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। स्नेहपूर्वक कहा – "मैं तुम लोगों को नारायण देख रहा हूँ। तुम्हीं लोग मेरे अपने आदमी हो।"
अब महिमाचरण भी कमरे में आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण – (महिमा से) – धैर्यरीता की बात उस समय जो तुम कह रहे थे, वह ठीक है। वीर्यधारण किये बिना इन सब बातों की धारणा नहीं होती।
"किसी ने चैतन्यदेव से कहा, 'आप इन भक्तों को इतना उपदेश दे रहे हैं, तो भी वे अपनी उतनी उन्नति क्यों नहीं कर पाते?'
"चैतन्यदेव ने कहा – 'ये लोग योषित्-संग करके सब अपव्यय कर देते हैं, इसीलिए धारणा नहीं कर सकते। फूटे घड़े में पानी रखने से क्रमशः सब निकल जाता है।'"
महिमा आदि भक्तगण चुपचाप बैठे हैं। कुछ देर बाद महिमाचरण ने कहा – ईश्वर के पास हम लोगों के लिए प्रार्थना कर दीजिये, जिससे हम लोगों को वह शक्ति प्राप्त हो।
श्रीरामकृष्ण – अब भी सावधान हो जाओ! सच है कि आषाढ़ का पानी है, रोकना मुश्किल है, परन्तु पानी निकल भी तो बहुत चुका है, अब बाँध बाँधने से रुक जायगा।
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