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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२५ मई, १८८४परिच्छेद ८१५०९

तुम्हीं अखण्ड हो, चराचर को व्याप्त किये हुए भी तुम्हीं हो। तुम्हीं आधार हो, तुम्हीं आधेय हो। प्राण-कृष्ण! मन-कृष्ण! बुद्धि-कृष्ण! आत्मा-कृष्ण! प्राण हे गोविन्द! मेरे जीवन हो!"

विजय को भी आवेश हो गया है। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, बाबू क्या तुम भी बेहोश हो गये हो?

विजय – (विनीत भाव से) – जी नहीं।

कीर्तन करनेवाली ने गाया – 'सदा ही हृदय में रखती, ऐ प्राण प्यारे!' श्रीरामकृष्ण फिर समाधिमग्न हो गये। – टूटा हाथ भवनाथ के कन्धे पर है।

श्रीरामकृष्ण का मन जब कुछ बहिर्मुख हुआ, तब गानेवाली ने गाया – तुम्हारे लिए जिसने सर्वस्व का त्याग किया, उसे भी इतना दुःख!

श्रीरामकृष्ण ने गानेवाली को प्रणाम किया। बैठकर गाना सुन रहे हैं। – कभी कभी भावाविष्ट हो रहे हैं। गानेवाली ने गाना बन्द कर दिया। श्रीरामकृष्ण बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों के प्रति) – प्रेम किसे कहते हैं? ईश्वर पर जिसका प्रेम होता है – जैसे चैतन्यदेव का – वह संसार को तो भूल जायगा ही, किन्तु इतनी प्रिय वस्तु यह जो देह है, वह उसे भी भूल जायगा।

प्रेम के होने पर क्या होता है, इसका हाल श्रीरामकृष्ण एक गीत गाकर बतला रहे हैं। गीत का भाव है :–

"मेरे वे दिन कब आयेंगे जब हरि हरि कहते हुए मेरी आँखों से धारा बह चलेगी – शरीर पुलकायमान हो उठेगा – संसार की वासना मिट जायेगी – दुर्दिन दूर होंगे और सुदिन आयेंगे। ईश्वर की ऐसी दया कब होगी?"

श्रीरामकृष्ण खड़े होकर नृत्य कर रहे हैं। भक्तगण भी उनके साथ नाच रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने मास्टर की बाँह पकड़ कर उन्हें मण्डल के भीतर खींच लिया।

नृत्य करते हुए श्रीरामकृष्ण फिर समाधि में डूब गये। चित्रवत् खड़े रह गये। केदार समाधि भंग करने के लिए अब कह रहे हैं –

"हृदय-कमल मध्ये निर्विशेषं निरीहं, हरि-हर-विधि-वेद्यं योगिभिर्ध्यानगम्यम्। जनन-मरण-भीति-भ्रंशि सच्चित्स्वरूपं, सकल-भुवन-बीजं ब्रह्म-चैतन्यमीड़े।।"

क्रमशः श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। उन्होंने आसन ग्रहण किया और नाम ले रहे हैं – ॐ सच्चिदानन्द! गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द! योगमाया! – भागवत भक्त भगवान!

कीर्तन और नृत्य की जगह की धूल श्रीरामकृष्ण ले रहे हैं।

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