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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१५ जून, १८८४परिच्छेद ८२५१३

मित्रों के साथ, उपर्युक्त तालाब के किनारे टहल रहे हैं। कोई कोई बँधे घाट पर जाकर थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हैं।

संकीर्तन हो रहा है। संकीर्तनवाले कमरे में बहुत से भक्त एकत्र हुए हैं। भवनाथ, निरंजन, राखाल, सुरेन्द्र, राम, मास्टर, महिमाचरण और मणि मल्लिक आदि कितने ही भक्त आये हैं। बहुत से ब्राह्मभक्त भी उपस्थित हैं।

कृष्णलीला गायी जा रही है। कीर्तनिया पहले गौर-चन्द्रिका गा रहा है। गौरांग ने संन्यास धारण किया है – वे कृष्ण के प्रेम में पागल हो गये हैं। उन्हें न देखकर नवद्वीप की भक्तमण्डली विलाप कर रही है। यही गीत कीर्तनिया गा रहा है।

श्रीरामकृष्ण को भावावेश है। एकाएक खड़े होकर बड़े ही करुणापूर्ण स्वरों में एक पद गाने लगे – “सखि! तू मेरे प्राणवल्लभ को मेरे पास ले आ या मुझे ही वहीं छोड़ आ।” श्रीरामकृष्ण को राधिका का भाव हो गया है। ये बातें कहते ही उनकी जबान रुक गयी। देह निःस्पन्द हो गयी और आँखें अर्धनिमीलित रह गयीं। उनका बाह्य-ज्ञान बिलकुल जाता रहा। वे समाधिमग्न हो गये।

बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण अपनी साधारण दशा में आये। फिर वही करुण-स्वर! कहते हैं – “सखि! उसके पास ले जाकर तू मुझे खरीद ले, मैं तेरी दासी हो जाऊँगी। कृष्ण का प्रेम मुझे तू ही ने तो सिखाया था – प्राणवल्लभ!”

कीर्तनियों का गाना होने लगा। श्रीमती कह रही हैं – ‘सखि! मैं यमुना में पानी भरने न जाऊँगी। कदम्ब के नीचे प्रिय सखा को मैंने देखा था। उसे देखते ही मैं विह्वल हो जाती हूँ।’

श्रीरामकृष्ण को फिर आवेश हो रहा है। दीर्घ श्वास छोड़कर कातर भाव से कह रहे हैं – ‘आहा! आहा!’

कीर्तन हो रहा है। श्रीराधा की उक्ति – (कीर्तन का भाव) –

“संग-सुख की लालसा से मैं उनके शीतल अंग का निरीक्षण किया करती हूँ। माना कि वह तुम लोगों का है, परन्तु मुझे उसके दर्शन भी तो एक बार करा दो। वह भूषणों का आभूषण जब चला गया, तब ये भूषण किस काम के रहे? मेरे सुदिन चले गये हैं, ये दुर्दिन आये हैं। दुर्दशा के दिनों के आते कुछ देर भी न लगी।”

“सखि! मैं डूब मरूँगी, भला कह तो सही, कन्हैया जैसे गुणागार को मैं किसे दे जाऊँ? परन्तु देख, राधा की देह को जला न देना, पानी में भी उसे प्रवाहित न करना, वह कृष्ण के विलास की देह है, उसे तमाल की ही डाल पर रखना; क्योंकि कृष्ण भी काले हैं और तमाल की डाल भी काली है!”