श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५१४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १५ जून, १८८४ |
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श्रीराधा की मूर्छित दशा का वर्णन
“श्रीराधा मूर्छित हो गयीं, ज्ञान जाता रहा, जीवन की संगिनी ने आँखें भी मूँद लीं। कोई सखी उनकी देह में चन्दन लगाती है और कोई दुःख के आँसू बहा रही है। कोई उसके मुँह पर जल-सिंचन भी करती है।
“उन्हें मूर्छित देख सखियाँ कृष्ण का नाम ले रही हैं। कृष्ण का नाम सुन उन्हें चेतना हो आयी! तमाल देखकर वे सोचती हैं कि कहीं कृष्ण तो सामने आकर नहीं खड़े हो गये।
“सखियों ने सलाह करके मथुरा में कृष्ण के पास एक दूती को भेजा। समवयस्क किसी मथुरानिवासिनी से उसका परिचय हो गया। गोपियों की दूती ने कहा, मुझे बुलाना न होगा, वह आप ही आ जायेंगे। जहाँ पर कृष्ण हैं, वहीं मथुरानिवासिनी के साथ वह दूती जा रही है। वह रास्ते में विकल हो, रोकर कृष्ण को पुकार रही है –
'हे गोपियों के जीवनाधार! तुम कहाँ हो? – प्राणवल्लभ! राधावल्लभ! लज्जानिवारण हरि! एक बार तो दर्शन दे दो। मैंने बड़ा गर्व करके इन लोगों से कहा है कि तुम आप ही मिलोगे।'
गाना – “मधुपुर की नागरी हँसकर कहती है, 'ऐ गोकुल की गोपकुमारी, सातवें द्वार के उस पार राजा रहते हैं, क्या तू वहाँ तक जायगी? और तू जायगी भी कैसे? तेरी हिम्मत देखकर तो मुझे लाज आती है।' उसकी ये बातें सुनकर दूती दुःखित हो कृष्ण को पुकारने लगी – 'हे गोपियों के जीवन! हे नागर! हाय, तुम कहाँ हो? दर्शन दे दासी के प्राणों की रक्षा करो।' ”
“हे गोपियों के जीवन! तुम कहाँ हो?” इतना सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। अन्त में कीर्तनिये ऊँचे स्वर से कीर्तन गाने लगे। श्रीरामकृष्ण फिर खड़े हो गये। समाधिमग्न। कुछ होश आने पर अस्पष्ट स्वरों में कह रहे हैं – 'किट्न्-किट्न्' (कृष्ण-कृष्ण), भाव में भरपूर मग्न हैं। पूरा नाम उच्चारण नहीं कर सकते।
राधा-कृष्ण का मिलनगीत कीर्तनिये गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भी गाते हैं – “राधा खड़ी है, अंग झुकाये हुए, श्याम के बाईं ओर मानो तमाल को घेरकर।”
अब नामकीर्तन होने लगा। खोल-करताल लेकर अब कीर्तनिये एक साथ गाने लगे। भक्तगण पागलसे हो गये। श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। उन्हें घेरकर भक्तगण भी आनन्द से नाच रहे हैं। सब लोग 'जय राधे गोविन्द जय राधे गोविन्द' कह रहे हैं।
कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने जरा देर के लिए आसन ग्रहण किया। इसी समय निरंजन आये और श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर ही खड़े हो गये। आनन्द से श्रीरामकृष्ण की आँखें उज्ज्वल हो गयीं, कहा, “तू आ गया! (मास्टर से) देखो, यह लड़का बड़ा सरल है। सरलता पूर्वजन्मार्जित बहुत बड़ी तपस्या का फल है। कपटाचार, पटवारी बुद्धि, इन सब के रहते ईश्वर-प्राप्ति नहीं होती।