भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 546

१५ जून, १८८४

परिच्छेद ८२

५२३

टूटने लगा। तब जान बचाने की फिक्र हुई। वह घर से निकल आया। निकलते समय कहा – 'धत्तेरे घर की!'

(प्रताप से) “केशव के नाम की रक्षा तुम्हें न करनी होगी। जो कुछ हुआ है, समझना, उन्हीं की इच्छा से हुआ है। उनकी इच्छा से हुआ और उन्हीं की इच्छा से जा रहा है; तुम क्या कर सकते हो? तुम्हारा इस समय कर्तव्य है कि ईश्वर पर सब मन लगाओ – उनके प्रेम के समुद्र में कूद पड़ो।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण अपने मधुर कण्ठ से गाने लगे –

“ऐ मन, रूप के समुद्र में तू डूब जा, तलातल और पाताल तक में जब खोज करेगा, तब वह प्रेम रत्न तेरे हाथ लगेगा।”

(प्रताप से) “गाना सुना? लेक्चर और झगड़ा यह सब तो बहुत हो चुका, अब डुबकी लगाओ। और इस समुद्र मे डूबने से फिर मरने का भय न रह जायगा, यह तो अमृत का समुद्र है! यह न सोचना कि इससे आदमी का दिमाख बिगड़ जाता है। यह न सोचना की ज्यादा ईश्वर ईश्वर करने से आदमी पागल हो जाता है। मैंने नरेन्द्र से कहा था –

प्रताप – महाराज, नरेन्द्र कौन?

श्रीरामकृष्ण – है एक लड़का। मैंने नरेन्द्र से कहा था, ईश्वर रस का समुद्र है। क्या तेरी इच्छा इस रस के समुद्र में डुबकी लगाने की नहीं होती? अच्छा, सोच, एक नाँद में रस है और तू मक्खी हो गया है, तो कहाँ बैठकर रस पीयेगा? नरेन्द्र ने कहा, मैं नाँद के किनारे पर बैठकर रस पीऊँगा। मैंने पूछा, क्यों? किनारे पर क्यों बैठेगा? उसने कहा, ज्यादा बढ़ जाऊँगा तो डूब जाऊँगा और जान से भी हाथ धोना होगा। तब मैंने कहा, बेटा, सच्चिदानन्द-समुद्र में वह भय नहीं है। वह तो अमृत का समुद्र है, उसमें डुबकी लगाने से मृत्यु का भय नहीं है। आदमी अमर हो जाता है। ईश्वर के लिए पागल होने से आदमी का सिर बिगड़ नहीं जाता।

(भक्तों से) “मैं और मेरा, इसे अज्ञान कहते हैं। रासमणि ने कालीमन्दिर की प्रतिष्ठा की है; यही बात लोग कहते हैं। कोई यह नहीं कहता कि ईश्वर ने किया है। ब्राह्म समाज अमुक आदमी ने तैयार किया, यही लोग कहेंगे; कोई यह न कहेगा कि ईश्वर की इच्छा से यह हुआ है। मैंने किया, यह अज्ञान है। हे ईश्वर तुम कर्ता हो, मैं अकर्ता; तुम यन्त्री हो, मैं यन्त्र; यह ज्ञान है। हे ईश्वर, मेरा कुछ भी नहीं है – न यह मन्दिर मेरा है, न यह कालीबाड़ी न यह समाज, ये सब तुम्हारी चीजें हैं। यह स्त्री, पुत्र, परिवार, कुछ भी मेरा नहीं। सब तुम्हारी चीजें हैं; इसी का नाम ज्ञान है।

“मेरी वस्तु, मेरी वस्तु कहकर, उन सब चीजों को प्यार करना ही माया है। सब को प्यार करने का नाम दया है। मैं केवल ब्राह्म समाज के आदमियों को प्यार करता हूँ या अपने परिवार के मनुष्यों को, यह माया है। केवल देश के आदमियों को प्यार करता हूँ, यह माया