श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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Read in context५२४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४
है। सब देशों के मनुष्यों को प्यार करना, सब धर्मों के लोगों को प्यार करना, यह दया से होता है, भक्ति से होता है।
"माया से आदमी बँध जाता है, ईश्वर से विमुख हो जाता है। दया से ईश्वर की प्राप्ति होती है। शुकदेव, नारद, इनमें दया थी।"
(८)
ब्राह्म समाज और कामिनी-कांचन
प्रताप – महाराज, जो लोग आपके पास आते हैं, क्या क्रमशः उनकी उन्नति हो रही है?
श्रीरामकृष्ण – मैं कहता हूँ, संसार करने में दोष क्या है? परन्तु संसार में दासी की तरह रहो।
"दासी अपने मालिक के मकान को कहती है, 'हमारा मकान', परन्तु उसका अपना मकान कहीं किसी गाँव में होता है। मुख से तो वह मालिक के मकान को कहती है 'हमारा घर', परन्तु मन ही मन जानती है कि वह उसका घर नहीं, उसका घर एक दूसरे गाँव में है। और मालिक के लड़के को सेती है और कहती है, मेरा हरि बड़ा बदमाश हो गया, मेरे हरि को मिठाई पसन्द नहीं आती! 'मेरा हरि' वह मुख ही से कहती है, मन ही मन जानती है, हरि मेरा लड़का नहीं, मालिक का लड़का है।
"इसीलिए तो, जो लोग आते हैं, उनसे कहता हूँ संसार में रहो, इसमें दोष नहीं; परन्तु मन ईश्वर पर रखो। समझना कि घर-द्वार, संसार-परिवार तुम्हारे नहीं हैं, ये सब ईश्वर के हैं। समझना कि तुम्हारा घर ईश्वर के यहाँ है। मैं उनसे यह भी कहता हूँ कि व्याकुल होकर उनकी भक्ति के लिए उनके पाद-पद्मों में प्रार्थना करो।"
विलायत की बात फिर होने लगी। एक भक्त ने कहा, महाराज, आजकल विलायत के विद्वान लोग, सुना है, ईश्वर का अस्तित्व नहीं मानते।
प्रताप – मुँह से चाहे वे कुछ भी कहें, पर यह मुझे विश्वास नहीं होता कि उनमें कोई सच्चा नास्तिक है। इस संसार की घटनाओं के पीछे एक कोई महान् शक्ति है, यह बात बहुतों को माननी पड़ी है।
श्रीरामकृष्ण – तो बस हो गया। शक्ति तो मानते हैं न? तो नास्तिक फिर क्यों हैं?
प्रताप – इसके अतिरिक्त यूरोप के पण्डित, Moral Government (सत्कर्मों का पुरस्कार और पाप का दण्ड इस संसार में होता है) – यह बात भी मानते हैं।
बड़ी देर तक बातचीत होने के बाद प्रताप चलने के लिए उठे।
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – तुम्हें और क्या कहूँ? केवल इतना कहता हूँ कि अब वाद-विवाद के बीच में न रहो।