सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / १७ सुदामाचरित की कथावस्तु की समीक्षा आधार की दृष्टि से काव्याचार्यों ने कथावस्तु के तीन भेद माने हैं—प्रख्यात, उत्पाद्य और मिश्रित। 'सुदामा-चरित' की कथावस्तु मुख्यतः प्रख्यात है। प्रख्यात कथावस्तु का आधार इतिहास, पुराण या जनश्रुति होता है। 'सुदामा- चरित' की कथावस्तु का मुख्य आधार श्रीमद्भागवत पुराण है। कविवर नरोत्तमदास ने अपनी इस अमर कृति के लिए एक ओर श्रीमद्भागवत पुराण के दशम् स्कन्ध से कथानक का चयन किया और दूसरी ओर अनेक मौलिक उद्भावनाएँ करके अपनी काव्य-प्रतिभा का परिचय दिया है। वे मौलिक उद्भावनाएँ हैं— १. सुदामा की निर्धनता को मार्मिकता प्रदान करने के लिए हठात एक दिवस निर्धन सुदामा के मुख से यह कहलवाना कि वे द्वारिकापति श्रीकृष्ण के सहपाठी तथा मित्र हैं। २. सुदामा के भक्त-रूप के साथ-साथ, उनके मानव-रूप को भी चित्रित करना; उनके मन में दबी धन-लालसा को जगाना, धन न मिलने पर उनका श्रीकृष्ण को कोसना, शाप देने को तत्पर हो जाना, अपनी पत्नी पर झुँझलाना, जिसने उन्हें बार-बार आग्रह करके द्वारिकापुरी भेजा था। ३. घर लौटकर बड़ी कठिनाई से अपने घर, पत्नी आदि को पहचानना और पत्नी के प्रति आभार प्रदर्शित करना, जिसकी प्रेरणा के अभाव में उन्हें वह अपार-वैभव नहीं मिल सकता था। ४. सुदामा की पत्नी सुशीला के नाम को बदलना, उसे सुबुद्धि नाम देना। श्रीमद्भागवत में सुदामा की पत्नी का नाम सुशीला है, जिसे कविवर नरोत्तम- दास ने बदल दिया है। वे सुशीला के स्थान पर सुबुद्धि नाम का प्रयोग करते हैं। इस नाम परिवर्तन के पीछे सुदामा-पत्नी का महत्त्व निहित है। सुदामा की निर्धनता को दूर कराने में उनकी पत्नी का बुद्धि-वैभव अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है। वह अपने तर्कों द्वारा विरक्त एवं सन्तोषी ब्राह्मण सुदामा के मन में धन-लालसा को जागृत करती है। उसी की प्रेरणा से वे द्वारिकापुरी