सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ें: २ :
तन्दुरुस्ती
जिन्दगी दुनिया की सबसे बड़ी न्यामत है। पर उसका सच्चा आनन्द तभी है जब 'तन्दुरुस्ती' ठीक है। तन्दुरुस्ती ठीक न रहने से जिन्दगी का मजा किरकिरा हो जाता है। ऐसा आदमी न तो सुख भोग सकता है न कोई काम-काज ही कर सकता है। वह खुद तो तकलीफ पाता ही है, घर के दो-चार आदमी भी उसकी टहल में लगे रहते हैं और काम का हर्ज होता है। इसके सिवा रोगी आदमी से दूसरों को भी खतरा रहता है, क्योंकि कुछ रोग छूत के होते हैं और उड़कर दूसरों को लग जाते हैं। फिर तन्दुरुस्ती जब एक बार खराब हो जाती है तो फिर उसका सुधार मुश्किल से होता है। रुपया भी खर्च होता है और हर्जा भी होता है, फिर भी कभी-कभी पहले जैसी तन्दुरुस्ती नहीं मिलती। इसलिए हरेक आदमी को अपनी तन्दुरुस्ती का खयाल रखना चाहिए।
बेसमक आदमी यह कहा करते हैं कि बीमारी पर अपना बस नहीं है, देवताओं के क्रोप से बीमारी होती है, इसीसे वे रोगी होने पर दवा-दारू तो नहीं करते दबी-देवताओं की पूजा करते हैं। या रोग को भूत-प्रेत का असर समझ कर रथाने-दिवानों से