भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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दिन और गत के काम

देह है। हरेक स्त्री-पुरुष को स्नान के समय अपने कपड़े साबुन या सोडा जो सुलभ हो सके, उससे रोज थो डालने चाहिए। रक्तीन और गोटे-किनारी के कपड़े जहाँतक सम्भव हो काम में न लाने चाहिए। उन्हें साफ करने में बड़ी दिक्कत पेश आती है। मैले कपड़े पहनना बड़ी शर्म की बात है। जो लोग साफ कपड़े पहनते हैं, उनकी सब इज्जत करते हैं।

कुछ लोग स्नान के बाद हवाखोरी करते हैं और कुछ लोग इसके पहले। हवाखोरी के लिए खुले मैदान या सुन्दर बगीचों में जाना अच्छा है। खेतों में भी हवाखोरी के लिए हवाखोरी जाना अच्छा है। पर वहाँ गन्देशी न रहनी चाहिए। रोजाना कम-से-कम दो मील का चक्कर लगाना चाहिए। काम-काज के लिए घूमना और हवाखोरी एक बात नहीं है। हवाखोरी में मरित्पक् प्रफुल्ल रहना चाहिए। सब चिन्ता त्याग देना चाहिए। धूल उड़ती हो या तेज धूप हो या बारिश हो उस समय हवाखोरी नहीं करनी चाहिए। पूर्वी हवा भारी-भारम, और चिकनी होती है। गठिया बाय, बवासीर, बुखार और दमे के बीमारों को पुर्वा हवा में नहीं घूमना चाहिए। पच्छिमा हवा तेज, ठण्डी, और रुखी है। ज्वरम भरती है, चर्बी को सुखाती है। हवाखोरी के लिए अच्छी है। उत्तरी हवा ठण्डी और गीला करने वाली है। वरसात के दिनों में बादल खुले हों तो उत्तरी हवा में घूमना चाहिए। उत्तरी हवा में भीगना खतरनाक है। दक्षिणी हवा मन को खुश करनेवाली, खून को साफ करनेवाली, हल्की,