सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)
Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary
श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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25 ता कउ हाथि न आवै केह ॥ मन हरि के नाम की प्रीति सुखदाई ॥ करि किरपा नानक आपि लड़े लाई ॥३॥ मिथिआ तनु धनु कुटंबु सबाइआ ॥ मिथिआ हउमै ममता माइआ ॥ मिथिआ राज जोबन धन माल ॥ मिथिआ काम क्रोध बिकराल ॥ मिथिआ रथ हसती अस्ब बसत्रा ॥ मिथिआ रंग संगि माइआ पेखि हसता ॥ मिथिआ द्रोह मोह अभिमानु ॥ मिथिआ आपस ऊपरि करत गुमानु ॥ असथिरु भगति साध की सरन ॥ नानक जपि जपि जीवै हरि के चरन ॥४॥ मिथिआ स्रवन पर निंदा सुनहि ॥ मिथिआ हसत पर दरब कउ हिरहि ॥ मिथिआ नेत्र पेखत पर तृअ रूपाइ ॥