सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)
Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary
श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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74 सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥ राम नाम जो करहि बीचार ॥ से धनवंत गनी संसार ॥ मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ॥ सदा सदा जानहु ते सुखी ॥ इको इकु इकु पछानै ॥ इत उत की एहु सोझी जानै ॥ नाम संगि जिस का मनु मानिआ ॥ नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥३॥ गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ॥ तिस की जानहु तृसना बुझै ॥ साधसंगि हरि हरि जसु कहत ॥ सरब रोग ते एहु हरि जनु रहत ॥ अनदिनु कीरतनु केवल बख्यानु ॥ गृहसत महि सोई निरबानु ॥ इक ऊपरि जिसु जन की आसा ॥