सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पूरन ब्रह्म विचार निरतर, काम न क्रोध न लोभ न मोहै। श्रोत्र त्वचा रसना अरु घ्राण सु, देखि कछू कहु नैन न मोहै॥ ज्ञान स्वरूप अरूप निरुपम, जासु गिरा सुनि मोहन मोहै। सुन्दरदास कहै कर जोरि जु, दादूदयालु हि मोर नमो है ॥२। धीरजवत अडिग्ग जितेन्द्रिय, निर्मेल ज्ञांन गह्यो दृढ आदू। शील संतोष क्षमा जिनके घट, लागि रह्यो सु अनाहद नादू॥ भेष न पक्ष निरतर लक्ष्यजु, और नही कछु वाद विवादू। (२) पूरण-पूर्ण, सर्वव्यापक। निरतर-सदा, अ या अव्यवहित, यथा (दादू निरतर पीव पाइया)। ग वाणी, उपदेश। (३) निर्मेल-निर्दोष, भ्रमसंशयादि दोषरहि दृढ-अविचल-निश्चयात्मक। निरतर-निष्पक्षभाव। हृदय मे। अनाहदनादू-अनाहत नाद, स्वत उद् सोऽहम् ध्वनि।