सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्राण, उदान, समान, ध्यान, अपान वायु | २२४ |
| नाना स्थानों में आश्रित वायु के प्रकोप से होनेवाले रोग | २२५ |
| अवयवों में पहुँचकर वायु असंख्य रोग होते हैं | २२५ |
| प्राण वायु के पित्त के साथ मिलने पर | २२६ |
| वातरक्त रोग का कारण | २२६ |
| सम्प्राप्ति | २२६ |
| पूर्वरूप, असाध्य, आक्षेप | २२७ |
| असाध्य अपतानक | २२७ |
| पक्षाघात, अपतन्त्रक, मन्यास्तम्भ आदि, असाध्य, गुह्रसी विरवाची, क्रोष्टुक शीर्ष, खञ्ज और पंगु, कलाय खञ्ज, वाथ कण्टक, पाददाह, पादद्वर्ष अवबाहुक, बाधियं, कर्णशूल, तूनी-प्रतूनी, आध्मान, प्रत्याध्मान, अछीला, प्रत्यछीला, २२७-२३३ | |
| द्वितीयोऽध्यायः | |
| अर्श निदान की व्याख्या | २३३ |
| अर्श छ प्रकार का है | २३४ |
| सामान्य कारण, गुदा, पूर्वरूप, सामान्यरूप, वातजन्य अर्श, पित्तजन्य अर्श | २३५ |
| कफजन्य अर्श, रक्तजन्य अर्श | २३५ |
| सन्निपातजन्य अर्श, सहजन्य अर्श | २३५ |
| मेढादि में अर्श, | २३६ |
| अनिमाम्नाय का कारण | २३७ |
| तृतीयोऽध्यायः | |
| अश्मरी निदान | २३७ |
| अश्मरी रोग के चार प्रकार | २३७ |
| सामान्यलक्षण | २३८ |
| रुलेष्माश्मरी पैत्तिक अश्मरी, वातजन्य अश्मरी, शुक्राश्मरी | २३८ |
| शर्करा, रोगी के लक्षण | २३९ |
| अश्मरी के मूत्रमार्ग में पहुँचने पर उपद्रव | २३९ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| बस्ति का मूत्र द्वारा सदा भरना | २३९ |
| अश्मरी की उत्पत्ति | २३९ |
| वायु के प्रतिलोम होने पर नाना रोग | २४१ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| भगन्दर निदान | २४१ |
| भगन्दर के पाँच प्रकार | २४१ |
| भगन्दर का पूर्वरूप | २४१ |
| शतपोनक भगन्दर | २४१ |
| उष्ट्रग्रीव भगन्दर | २४१ |
| परिखावि भगन्दर | २४१ |
| शम्बूकार्त भगन्दर | २४२ |
| उन्मार्गगामि भगन्दर | २४२ |
| सृजन के कारण गुदा के समीप पिङ्का | २४२ |
| असाध्यभगन्दर | २४२ |
| पञ्चमोऽध्यायः | |
| असाध्य कुष्ठरोग निदान | २४३ |
| कुष्ठ के कारण | २४३ |
| कुष्ठ का पूर्वरूप | २४३ |
| सात महाकुष्ठ और ११ लुद्र | |
| कुष्ठ के नाम | २४३ |
| महाकुष्ठ के लक्षण | २४३ |
| लुद्रकुष्ठों के लक्षण | २४४ |
| क्षुद्रकुष्ठों में कफ, वायु | |
| पित्तजन्य | २४४ |
| किलास का वर्णन | २४४ |
| त्वचा में कुष्ठ के लक्षण | २४५ |
| कुष्ठ के रक्त में होने पर | २४५ |
| मेद में कुष्ठ के पहुँचने पर | २४५ |
| माता पिता में कुष्ठ दोष के कारण | |
| संतान पर प्रभाव | २४५ |
| जितेन्द्रिय पुरुष का साध्य तथा | |
| असाध्य कुष्ठ रोग | २४६ |
| कर्मजन्य कुष्ठ | २४६ |
| कुष्ठ से अधिक दुःखदाई कोई नहीं | २४६ |
| कुष्ठरोग से मुक्ति | २४६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में यह रोग आ जाता है | २४६ |
| षष्ठोऽध्यायः | |
| त्रिदोषजन्य प्रमेह निदान | २४६ |
| प्रमेह के कारण | २४६ |
| प्रमेह के पूर्वरूप | २४६ |
| कफ के कारण दस प्रमेह | २४६ |
| पित्त के कारण छ प्रमेह | २४६ |
| वायु के कारण चार प्रमेह | २४७ |
| कफजन्य प्रमेह की व्याख्या | २४८ |
| पित्त " " | २४८ |
| वायु " " | २४८ |
| उपद्रव | २४८ |
| दशों पिङ्कायों की उत्पत्ति | २४९ |
| बीस प्रकार के प्रमेहों की उत्पत्ति | २४९ |
| सप्तमोऽध्यायः | |
| उदररोग की व्याख्या | २५० |
| उदर रोग के आठ प्रकार | २५० |
| कारण | २५१ |
| सम्प्राप्ति | २५१ |
| पूर्वरूप | २५१ |
| वातोदर | २५१ |
| पित्तोदर | २५१ |
| कफोदर | २५१ |
| सन्निपातोदर | २५१ |
| प्लीहोदर | २५२ |
| बद्धगुदोदर | २५२ |
| परिखाण्युदर | २५२ |
| दकोदर | २५२ |
| सामान्य लक्षण | २५३ |
| साध्यासाध्य लक्षण | २५३ |
| अष्टमोऽध्यायः | |
| मूद्गर्भ रोग निदान | २५३ |
| मूद्गर्भ के कारण | २५३ |
| मूद्गर्भ के चार प्रकार | २५३ |
| मूद्गर्भ की आठ गतियाँ | २५३ |
| असाध्य के लक्षण | २५३ |
| यह गर्भ भी असमय में गिरता है | २५४ |