भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५

त्मनैवात्मन उपसंक्रमणं संभ- | ही प्राप्त होना कभी सम्भव नहीं वति । स्वात्मनि भेदाभावात् । | है; क्योंकि अपने आत्मामें भेदका आत्मभूतं च ब्रह्म सङ्क्रमितुः । | सर्वथा अभाव है और ब्रह्म भी | संक्रमण करनेवालेका आत्मा ही है । शिरआदिकल्पनानुपपत्तेश्च । | [ आत्मामें ] शिर आदिकी न हि यथोक्तलक्षण आकाशादि- | कल्पना असम्भव होनेके कारण भी कारणेऽकार्यपतिते शिरआद्यवयव- | [ आनन्दमय कार्यात्मा ही है ] । रूपकल्पनोपपद्यते । "अदृश्ये- | आकाशादिके कारण और कार्यवर्गके ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने" (तै० | अन्तर्गत न आनेवाले उपर्युक्त उ० २ । ७ । १) "अस्थूल- | लक्षणविशिष्ट आत्मामें शिर आदि मनणु" (बृ० उ० ३ । ८ । ८) | अवयवरूप कल्पनाका होना संगत "नेति नेत्यात्मा" (बृ० उ० ३। ९ । | नहीं है । आत्मामें विशेष धर्मोंका २६) इत्यादिविशेषापोहश्रुति- | बाध करनेवाली "अदृश्य, अशरीर, भ्यश्च । | अनिर्वचनीय और अनाश्रयमें" "स्थूल | और सूक्ष्मसे रहित" "आत्मा यह | नहीं है यह नहीं है" इत्यादि श्रुतियोंसे | भी यही बात सिद्ध होती है । मन्त्रोदाहरणानुपपत्तेश्च । न | [ आनन्दमयको यदि आत्मा हि प्रियशिरआद्यवयवविशिष्टे | माना जाय तो ] आगे कहे हुए प्रत्यक्षतोऽनुभूयमान आनन्दमय | मन्त्रका उदाहरण देना भी नहीं आत्मनि ब्रह्मणि नास्ति ब्रह्मेत्या- | बनता । शिर आदि अवयवोंसे युक्त शङ्काभावात् "असन्नेव स | आनन्दमय आत्मारूप ब्रह्मके प्रत्यक्ष भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत्" | अनुभव होनेपर तो ऐसी शंका ही (तै० उ० २ । ६ । १) इति | नहीं हो सकती कि ब्रह्म नहीं है, | जिससे कि [ उस शंकाकी निवृत्ति- | के लिये ] "जो पुरुष, ब्रह्म नहीं | है—ऐसा जानता है वह असद्रूप तै० उ० १९-२०—