तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 201, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९५
[संस्कृत-मूलभाष्यम्] त्येवंवित् । एवंशब्दस्य प्रकृत- परामर्शार्थत्वात् । स किम् ? अस्माल्लोकात्प्रेत्य दृष्टादृष्टेष्टवि- षयसमुदायो ह्ययं लोकस्तस्मा- ल्लोकात्प्रेत्य प्रत्यावृत्य निरपेक्षो भूत्वैतं यथाव्याख्यातमन्नमय- मात्मानमुपसंक्रामति । विषयजात- मन्नमयात्पिण्डात्मनो व्यतिरिक्तं न पश्यति । सर्वं स्थूलभूतमन्न- मयमात्मानं पश्यतीत्यर्थः । ततोऽभ्यन्तरमेतं प्राणमयं सर्वान्न मयात्मस्थम विभक्तम् । अथैतं मनोमयं विज्ञानमयमा- नन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । अथादृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिल- यनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । तत्रैतच्चिन्त्यम् । कोऽयमेवं- [पार्श्व-टिप्पणी: तृतीयानुप्रश्न-विचारः] वित्कथं वा संक्राम- तीति । किं परस्मा- दात्मनोऽन्यः संक्रमणकर्ता प्रवि- भक्त उत स एवेति ।
[हिन्दी-अनुवाद] (इस प्रकार जाननेवाला) है; क्योंकि 'एवम्' शब्द प्रसंगमें आये हुए पदार्थ- का परामर्श (निर्देश) करनेके लिये हुआ करता है । वह एवंवित् क्या [करता है] ? इस लोकसे जाकर — दृष्ट और अदृष्ट इष्ट विषयों- का समुदाय ही यह लोक है, उस इस लोकसे प्रेत्य-प्रत्यावर्तन करके (लौटकर) अर्थात् उससे निरपेक्ष होकर इस ऊपर व्याख्या किये हुए अन्नमय आत्माको प्राप्त होता है । अर्थात् वह विषयसमूहको अन्नमय शरीरसे भिन्न नहीं देखता; तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण स्थूल भूतवर्गको अन्नमय शरीर ही समझता है । उसके भीतर वह सम्पूर्ण अन्नमय कोशोंमें स्थित विभागहीन प्राणमय आत्माको देखता है । और फिर क्रमशः इस मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है । तत्पश्चात् वह इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वचनीय और अनाश्रय आत्मामें अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है । अब यहाँ यह विचारना है कि यह इस प्रकार जाननेवाला है कौन ? और यह किस प्रकार संक्रमण करता है ? वह संक्रमणकर्ता परमात्मासे भिन्न है अथवा स्वयं वही है ।
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