भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७ प्राप्तो दोषो न शक्यः परिहर्तु- | यह ठीक है कि इस प्रकार प्राप्त | होनेवाला दोष निवृत्त नहीं किया मन्यतरस्मिंस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे- | जा सकता तथा उपर्युक्त दोनों | पक्षोंमेंसे किसी एकका अथवा किसी ऽवधृते व्यर्था चिन्ता स्यान्न तु | तीसरे निर्दोष पक्षका निश्चय हो | जानेपर भी यह विचार व्यर्थ ही सोऽवधृत इति तदवधारणार्थ- | होगा। किन्तु उस पक्षका निश्चय | तो नहीं हुआ है; अतः उसका | निश्चय करनेके लिये होनेके कारण त्वादर्थवत्येवैषा चिन्ता । | यह विचार सार्थक ही है । सत्यमर्थवती चिन्ता शास्त्रा- | पूर्व०—शास्त्रके तात्पर्यका निश्चय | करनेके लिये होनेसे तो सचमुच र्थावधारणार्थत्वात् । चिन्तयसि | यह विचार सार्थक है, परन्तु तू तो | केवल विचार ही करता है, निर्णय च त्वं न तु निर्णेष्यसि, | तो कुछ करेगा नहीं । किं न निर्णेतव्यमिति वेद- | सिद्धान्ती—निर्णय नहीं करना वचनम् ? | चाहिये—ऐसा क्या कोई वेदवाक्य है ? न। | पूर्व०—नहीं । कथं तर्हि ? | सिद्धान्ती—तो फिर निर्णय क्यों | नहीं होगा ? बहुप्रतिपक्षत्वात् । एकत्ववादी | पूर्व०—क्योंकि तेरा प्रतिपक्ष | बहुत है। वेदार्थपरायण होनेके त्वम्, वेदार्थपरत्वात्, बहवो हि | कारण तू तो एकत्ववादी है किन्तु | तेरे प्रतिपक्षी वेदबाह्य नानात्ववादी नानात्ववादिनो वेदबाह्यास्त्व- | बहुत हैं। इसलिये मुझे सन्देह है त्प्रतिपक्षाः । अतो ममाशङ्कां न | कि तू मेरी शङ्काका निर्णय नहीं निर्णेष्यसीति । | कर सकेगा। एतदेव मे स्वस्त्ययनं यन्मा- | सिद्धान्ती—तूने जो मुझे बहुत-से