तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ धीनत्वात्त्वामेव वदिष्यामि । | तुम्हारे ही अधीन है । वाक् और सत्यमिति स एव वाक्कायाभ्यां | शरीरसे सम्पादन किया जानेवाला संपाद्यमानः, सोऽपि त्वदधीन | वह अर्थ ही सत्य कहलाता है, वह एव संपाद्य इति त्वामेव सत्यं | भी तुम्हारे ही अधीन सम्पादन किया वदिष्यामि । | जाता है; अतः तुम्हींको मैं सत्य | कहूँगा । तत्सर्वात्मकं वाय्वाख्यं ब्रह्म | वह वायुसंज्ञक सर्वात्मक ब्रह्म मयैवं स्तुतं सन्मां विद्यार्थिनम- | मेरेद्वारा इस प्रकार स्तुति किये वतु विद्यासंयोजनेन । तदेव | जानेपर मुझ विद्यार्थीको विद्यासे ब्रह्म वक्तारमाचार्यं वक्तृत्व- | युक्त करके रक्षा करे । वही ब्रह्म सामर्थ्यसंयोजनेनावतु । अवतु | वक्ता आचार्यको वक्तृत्वसामर्थ्यसे मामवतु वक्तारमिति पुनर्वचन- | युक्त करके उसकी रक्षा करे । मेरी | रक्षा करे और वक्ताकी रक्षा करे-इस मादरार्थम् । ॐ शान्तिः शान्तिः | प्रकार दो बार कहना आदरके लिये शान्तिरिति त्रिवचनमाध्यात्म- | है । 'ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः'— काधिभौतिकाधिदैविकानां विद्या- | ऐसा तीन बार कहना विद्याप्राप्तिके | आध्यात्मिक, आधिभौतिक और प्राप्त्युपसर्गाणां प्रशमार्थम् ॥१॥ | आधिदैविक विघ्नोंकी शान्तिके | लिये है ॥ १ ॥ इति शीक्षावल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri