तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अनुवाक शीक्षाकी व्याख्या अर्थज्ञानप्रधानत्वादुपनिषदो | उपनिषद् अर्थज्ञानप्रधान है [ अर्थात् अर्थज्ञान ही इसमें मुख्य है ], अतः इस ग्रन्थके अध्ययनका ग्रन्थपाठे यत्नोपरमो मा भूदिति प्रयत्न शिथिल न हो जाय— इसलिये पहले शीक्षाध्याय आरम्भ किया शीक्षाध्याय आरभ्यते— | जाता है— शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥ हम शीक्षाकी व्याख्या करते हैं । [ अकारादि ] वर्ण, [ उदात्तादि ] स्वर, [ ह्रस्वादि ] मात्रा, [ शब्दोच्चारणमें प्राणका प्रयत्नरूप ] बल, [ एक ही नियमसे उच्चारण करनारूप ] साम तथा सन्तान ( संहिता ) [ ये ही विषय इस अध्यायसे सीखे जाने योग्य हैं ] । इस प्रकार शीक्षाध्याय कहा गया ॥ १ ॥ शिक्षा शिक्ष्यतेऽनयेति वर्णा- | जिससे वर्णादिका उच्चारण सीखा जाय उसे ‘शिक्षा’ कहते हैं अथवा द्युच्चारणलक्षणम् । शिक्ष्यन्त | जो सीखे जायें वे वर्ण आदि ही शिक्षा हैं । शिक्षाको ही ‘शीक्षा’ इति वा शिक्षा वर्णादयः । कहा गया है । [ शीक्षाशब्दमें शिक्षैव शीक्षा । दैर्घ्यं छान्दसम् । | ईकारका ] दीर्घत्व वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है । उस शीक्षाकी हम तां शीक्षां व्याख्यास्यामो विस्प- व्याख्या करते हैं अर्थात् उसका ष्टमा समन्तात्कथयिष्यामः । | सर्वतोभावसे स्पष्ट वर्णन करते हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri