तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
[संस्कृत-भाष्य] क्रमविवक्षार्थोऽथशब्दः सर्वत्र । पृथिवी पूर्वरूपं पूर्वो वर्णः पूर्व- रूपम् । संहितायाः पूर्वे वर्णे पृथिवीदृष्टिः कर्तव्येत्युक्तं भवति । तथा द्यौः उत्तररूपमाकाशोऽन्त- रिक्षलोकः संधिर्मध्यं पूर्वोत्तर- रूपयोः संधीयेते अस्मिन्पूर्वोत्तर- रूपे इति । वायुः संधानम् । संधीयतेऽनेनेति संधानम् । इत्य- धिलोकं दर्शनमुक्तम् । अथाधि- ज्यौतिषमित्यादि समानम् । इतीमा इत्युक्ता उपप्रदर्श्यन्ते । यः कश्चिदेवमेता महासंहिता व्याख्याता वेदोपास्ते । वेदेत्यु- पासनं स्याद्विज्ञानाधिकारात् “इति प्राचीनयोग्योपास्स्व” इति च वचनात् । उपासनं च यथा-
[हिन्दी-भाष्यार्थ] यहाँ दर्शनक्रम बतलाना इष्ट होनेके कारण 'अथ' शब्दकी सर्वत्र अनुवृत्ति करनी चाहिये । पृथिवी पूर्वरूप है । यहाँ पूर्ववर्ण ही पूर्वरूप कहा गया है । इससे यह बतलाया गया है कि संहिता (सन्धि) के प्रथम वर्णमें पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये । इसी प्रकार द्युलोक उत्तररूप (अन्तिम वर्ण) है, आकाश अर्थात् अन्तरिक्ष सन्धि—पूर्व और उत्तररूपका मध्य है अर्थात् इसमें ही पूर्व और उत्तररूप एकत्रित किये जाते हैं । वायु सन्धान है । जिससे सन्धि की जाय उसे सन्धान कहते हैं । इस प्रकार अधिलोक दर्शन कहा गया । इसीके समान 'अथाधिज्यौतिषम्' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ भी समझना चाहिये । 'इति' और 'इमाः' इन शब्दोंसे पूर्वोक्त दर्शनोंका परामर्श किया जाता है । जो कोई इस प्रकार व्याख्या की हुई इस महासंहिताको जानता अर्थात् उपासना करता है—यहाँ उपासनाका प्रकरण होनेके कारण 'वेद' शब्दसे उपासना समझना चाहिये जैसा कि 'इति प्राचीनयोग्योपास्स्व'¹ इस आगे (१ । ६ । २ में) कहे जानेवाले वचनसे सिद्ध होता है ।
१. हे प्राचीनयोग्य शिष्य ! इस प्रकार तू उपासना कर ।