तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
अहं वृक्षस्योच्छेदात्मकस्य | मैं अन्तर्यामीरूपसे वृक्ष अर्थात् संसारवृक्षस्य रेरिवा प्रेरयिता- | उच्छेदात्मक संसाररूप वृक्षका प्रेरक ऽन्तर्याम्यात्मना । कीर्तिः ख्या- | हूँ । मेरी कीर्ति-प्रसिद्धि पर्वतके तिर्गिरेः पृष्ठमिवोच्छ्रिता मम । | पृष्ठभागके समान ऊँची है । मैं ऊर्ध्व- ऊर्ध्वपवित्र ऊर्ध्वं कारणं पवित्रं | पवित्र हूँ—पवित्र—पावन अर्थात् पावनं ज्ञानप्रकाश्यं पवित्रं परं | ज्ञानसे प्रकाशित होने योग्य पवित्र ब्रह्म यस्य सर्वात्मनो मम सो- | परब्रह्म जिस मुझ सर्वात्माका ऽहमूर्ध्वपवित्रः । वाजिनीव वाज- | ऊर्ध्व यानी कारण है वह वतीव । वाजमन्नं तद्वति सवित- | मैं ऊर्ध्वपवित्र हूँ । 'वाजिनि रीत्यर्थः । यथा सवितर्यमृतमा- | इव'—वाजवान्के समान--वाज अर्थात् त्मतत्त्वं विशुद्धं प्रसिद्धं श्रुति- | अन्न उससे युक्त सूर्यके समान, स्मृतिशतेभ्य एवं स्वमृतं शोभनं | जिस प्रकार सैकड़ों श्रुति-स्मृतियों- विशुद्धमात्मतत्त्वमस्मि भवामि । | के अनुसार सूर्यमें विशुद्ध द्रविणं धनं सवर्चसं दीप्ति- | अमृत यानी आत्मतत्त्व प्रसिद्ध है मत्तदेवात्मतत्त्वमस्मीत्यनुवर्तते । | उसी प्रकार मैं भी सु अमृत अर्थात् ब्रह्मज्ञानं वात्मतत्त्वप्रकाश- | शोभन-विशुद्ध आत्मतत्त्व हूँ । कत्वात्सवर्चसम् । द्रविणमिव | वही मैं आत्मतत्त्व सवर्चस— द्रविणं मोक्षसुखहेतुत्वात् । | दीप्तिशाली द्रविण यानी धन हूँ—इस अस्मिन्पक्षे प्राप्तं मयेत्यध्याहारः | प्रकार यहाँ 'अस्मि (हूँ)' क्रिया- कर्तव्यः । | की अनुवृत्ति की जाती है । अथवा | आत्मतत्त्वका प्रकाशक होनेसे तेजस्वी | ब्रह्मज्ञान, जो मोक्षसुखका हेतु होने- | के कारण धनके समान धन है, | [ मुझे प्राप्त हो गया है ]—इस | पक्षमें [ 'अस्मि' क्रियाकी अनुवृत्ति | न करके ] 'मया प्राप्तम्' ( वह | मुझे प्राप्त हो गया है ) इसका | अध्याहार करना चाहिये ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri