वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५१ प्रशस्तपादभाष्यम् कार्याकार्यगतः संयोगः । स चैकस्माद्द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति । एकस्मात्तावत् तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुकवीरणसंयोगः । द्वाभ्यां संयोग से होती है एवं इसकी स्थिति (उस कारण के) कार्य और (उसी कारण के अकार्य) द्रव्यों में रहती है । यह (संयोगजसंयोग) एक संयोग से, दो संयोगों से एवं बहुत से संयोगों से भी उत्पन्न होता है । १. (एक संयोग से इस प्रकार उत्पन्न होता है कि) तन्तु और वीरण (तृणविशेष) के एक ही संयोग से दो तन्तुओं वाले एक पट और वीरण के संयोग की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कारणशब्देनात्र समवायिकारणमभिमतम्, अकारणशब्देन समवायिकारणादन्यदुच्यते । शेषमुदाहरणे व्यक्तीकरिष्यामः । स चैकस्माद् द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति । एकस्मात् तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुक- वीरणसंयोगः । वीरणसंयुक्तस्य तन्तोस्तन्त्वन्तरेण संयोगादुत्पन्नमात्रस्य द्वितन्तुकद्रव्यस्य निष्क्रियस्य समवायिकारणभूतैकतन्तुसंयोगिना वीरणेन संयोगः प्राक्तनात् तन्तुवीरणसंयोगा- देकस्माद्भवति, स चायं कारणाकारणपूर्वसंयोगपूर्वकः कथ्यते, द्वितन्तुकस्य समवायिकारणं तन्तुरकारणं वीरणं तयोः संयोगेन जनितत्वात् । कार्याकार्यगतश्चायं तन्तुकार्ये द्वितन्तुके शब्द से 'समवायिकारण से भिन्न' अभिप्रेत हैं । संयोगजसंयोग की और बातें हम इसके उदाहरण में कहेंगे । "स चैकस्माद् द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति, एकस्मात्तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुक- वीरणसंयोगः" अभिप्राय यह है कि जहाँ वीरण (तृणविशेष) के साथ संयुक्त एक तन्तु के दूसरे तन्तु के साथ संयोग से (द्वितन्तुक) पट की उत्पत्ति होती है । इस (द्वितन्तुक) पट का उस वीरण के साथ भी संयोग होता है जो क्रिया से सर्वथा रहित है एवं इस पट के समवायिकारणीभूत तन्तु के साथ संयुक्त है । पट एवं (तन्तुसंयुक्त) वीरण का यह संयोग (कथित) तन्तु और वीरण के संयोग से ही उत्पन्न होता है । इसी प्रकार का संयोगजसंयोग 'कारणाकारणसंयोगपूर्वक' कहलाता है; क्योंकि उक्त द्वितन्तुक पट का समवायिकारण है तन्तु एवं अकारण है वीरण, इन दोनों के संयोग से वह उत्पन्न होता है । यह (संयोगजसंयोग) 'कार्याकार्यगत' भी है; क्योंकि (असमवायिकारणीभूत तन्तु और वीरण के संयोग का एक सम्बन्धी)' तन्तु के कार्य द्वितन्तुक पट एवं उस तन्तु के अकार्य वीरण इन दोनों में वह संयोग समवाय सम्बन्ध से है । उक्त (पट और वीरण के) संयोग का (असमवायि) कारण (तन्तु और वीरण का) संयोग ही है; क्योंकि यहाँ दूसरा कोई असमवायिकारण नहीं हो सकता । अतः संयोग में संयोग की कारणता परिशेषा-